आज अख़बार में एक रोचक समाचार पढ़ने का सौभाग्य हुआ जहाँ मध्य प्रदेश के सागर संभाग स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालय के एक निजी महाविद्यालय के अर्थशास्त्र के छात्रों ने नक़ल का वह उदाहरण प्रस्तुत किया कि बरबस ही होठों पर मुस्कान आ गई और मन प्रफुल्लित हो गया. अनैतिक मूल्यों की पूजा करते इस महाविद्यालय के अर्थशास्त्र के इन छात्रों ने कॉलेज प्रशासन के प्रश्रय में सामूहिक नक़ल का नया आयाम प्रदर्शित किया.
समानता के भाव से बिना आरक्षण की बुराइयों के शुद्ध मन से नकल करते हुए प्रश्नों के उत्तर लिखने में चैट जीपीटी का उपयोग किया गया और उत्तर जस के तस उतार दिए गए. यहाँ तक कि यह भी लिख दिया उत्तर पुस्तिका में कि वीडियो देखने के लिए वीडियो लिंक को क्लिक कीजिए !
अर्थात्त नक़ल करते समय सुधि-छात्र ने अपने मस्तिष्क में उपस्थित मेधावी स्मरण कोशिकाओं का भरपूर उपयोग करते हुए कॉपी कर पेस्ट करने की अलौकिक क्षमताओं को इस उच्च स्तर पर ले आए कि जैसा चैट-जीपीटी ने लिखा वैसा का वैसा पूरा का पूरा अर्थशास्त्र की उत्तर पुस्तिका में लिख दिया. साधुवाद है आज की पीढ़ी के छात्र को!
परंतु दुख का विषय यह हुआ कि विश्वविद्यालय के प्राध्यापक ने जाँचते समय जब यह पढ़ा तो उन्होंने रजिस्ट्रार को सूचना दी और जब समस्त उत्तर पुस्तिकाओं का अवलोकन किया गया तो यह प्राप्त हुआ कि समस्त छात्रों ने एक जैसे ही उत्तर ही लिखे हैं.
यह दुखड़ा नहीं सुखद है कि छात्रों में नकल के प्रति आसक्ति, प्रेम, लगाव और मोहब्बत का जो निर्मल भाव समानता के सिद्धांत के साथ में प्रचलित है वह यह प्रदर्शित करता है कि छात्र तो बेचारे हैं, लाचार हैं भयग्रस्त हैं कि कहीं फेल न हों जायें. ये तो
महाविद्यालय के प्रशासन का नैतिक कर्तव्य पालन है कि कोई भी छात्र फेल न होने पाए भले ही इस हेतु शिक्षण, प्रशिक्षण, प्रायोगिक कार्य, ट्यूटोरियल, सेशनल, फील्ड ट्रिप, एन सी सी , एन एस एस के आवश्यक बिंदुओं पर कार्य पूर्ण न होने पाए. इस संबंध में समस्त प्रशासन प्राध्यापक से लेकर प्यून तक एक मुट्ठी बन कर तैयार होते हैं और मिल – जुलकर कॉलेज के स्वामी के आदेश पालन में झुंड – नकल के समानता के अधिकार का पालन कराने के उद्देश्य से एक समिति के रूप में काम करते हैं. और हुए एक साथ मिलकर नकल कराते हैं.
संविधान में इस नक़ल के अधिकार हेतु अनुच्छेद का उल्लेख करना रह गया था तो नक़ल के देवता स्वयंभू उत्पन्न हुए और भारतीय सामाजिक व्यवस्था में नकल का स्वयंभू बोया गया बीज पनपता गया.
पुरानी लोकोक्ति है कि कद्दू कटेगा तो सबमें बंटेगा . इस सिद्धांत के चलते चैट-जीपीटी जैसे सवालों के उत्तर देने वाले इंटरनेट के रावण के आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस से मस्तिष्क की स्मरण शक्ति पिछड़ती जा रही है और नक़ल का कद्दू सबको बंट रहा है.
किसी भी चोरी को यदि रोकने के प्रयास किया जाए तो वह किसी भी जातक के लिए उत्तेजना का स्रोत बन सकती है और इसे देखते हुए कई देशों के विश्वविद्यालयों में प्रश्न पत्र के साथ संबंधित विषय की पुस्तक दिए जाने की भी प्रावधान है और इसके लिए स्केलिंग द्वारा अंक वितरण भी किए जाते हैं.
नैतिक रूप से छात्रों की परीक्षा में नकल संबंधी आत्म-नियंत्रण अथवा सेल्फ- पुलिसिंग के उदाहरण भी प्राप्त होते हैं जहाँ अनुपस्थित रहे छात्रों को अगले दिन पूर्व में हुई परीक्षा प्रश्न पत्र दिए जाते हैं और आत्म नैतिक बल के साथ शुद्धता के साथ साथी से भी प्रश्न पूछे बिना परीक्षा संपन्न होती है.
नकल करने की भारतीय व्यवस्था में जारी इस समानता के भाव के कारण सभी छात्र न्यूनतम पासिंग मार्क्स से सफ़ल घोषित हो जाएँगे परंतु जीवन के काल-खंडों में आने वाले उतार-चढ़ाव का सामना रोते-झींकते करेंगे फिर सामाजिक व्यवस्था को दोष देंगे, राजनीतिक तंत्र को कोसेंगे और प्रशासनिक व्यवस्था को अक्षम घोषित करेंगे. क्या नकल के लिए सामाजिक स्वीकार्यता शिव का विष बनेगी जिसे समाज को पीना ही होगा या युधिष्ठिर के समक्ष यक्ष प्रश्न के रूप में उपस्थित होगी कि क्या नकल की अद्वैत सच्चाई से समाज का विघटन होगा? यह रोचक विषय हो सकता है !
एक और अद्भुत घटनाक्रम में समानता के इस आसान विचार में भारत के पूर्वोत्तर राज्य में क्लर्क ग्रेड की परीक्षा के लिए नियुक्त निजी परीक्षा संस्था के राज्य के निवासी कर्मचारियों ने अपनी स्वयं की सरकारी नौकरी पक्की करने के लिए स्वयं परीक्षा दे ली और वरीयता सूची में नाम आ गए. कितना सुविधाजनक रहा होगा न ये कि परीक्षा एजेंसी भी अपन, परीक्षा पेपर के सेटर भी अपन, परीक्षा दें वाले भी अपन, परीक्षा के अंक देने की मशीन के निर्धारक भी अपन और परीक्षाफल जारी करने वाले भी अपन. और अंततः परीक्षा के इस नकल नाटक का उत्तम परिणाम अपने पक्ष में ही आ जाए तो सोने पे सुहागा.
कदाचित सरकारों को कोई दोष दिया जाना उचित नहीं है लेकिन नागरिक के रूप में हम सब नक़ल के लिए राजी हैं, सहमत है, हामी हैं. नैतिक बोल-चाल की भाषा में हम भारतीय इन नक़ल के भ्रष्ट कार्यों के लिए राजी नहीं है परंतु जब स्वयं के नक़ल करने की बात आती है तो नकल हमारा छुपा हुआ अधिकार बन जाता है.
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