ई.एस.आई. ट्यूबरक्लोसिस हॉस्पिटल – एक अनुभव
कितनी उम्र है बाबा?
91 बरस!
क्या वाक़ई?
हां बेटा, 1935 का जन्म है!
अरे वह आप तो मेरे पिता जी की उम्र के साथी हैं.
स्वच्छ कुर्ता पजामा पहने मास्क लगाये जब यह बाबा जी मेरे क्लिनिक-कक्ष में प्रविष्ट हुए तो सत्तर साल के बुजुर्ग दिख रहे थे परंतु जब उपचार पत्रक पर उम्र देखी तो आश्चर्य हुआ और पूछ ही लिया.
अद्भुत !
जब विचार आया कि बाबा जी तो एक अलग दौर के पुरोधा हैं और इनसे बात करनी चाहिए तो पेन रख दिया और बातचीत करने लगा.
ज्ञात हुआ कि
बाबा जी साइकिल से इस सरकारी बीमा अस्पताल में आए थे. वे एक दुकान पर पचहत्तर वर्ष की उम्र तक दुकान पर कार्य करते रहे. जब पूछा कि आज़ादी के पहले के दौर में जो आपने देखा वो क्या याद है तो उनकी बातें सुन आश्चर्य चकित होने के साथ साथ समाज की नैतिक शुद्धता की जानकारी से गला रुँध गया.
वे बताने लगे कि भोजन की शुद्धता बहुत ही थी. भोजन हेतु अनाज, फल, घी, दूध आदि कम था परंतु शुद्ध था. बारिश का जमा किया हुआ और कुओं का पानी ही पीने को मिलता था परंतु शुद्ध था. कोई फ़िल्टर लगाना नहीं पड़ता था. सड़क पर, समारोह में या त्योहारों में महिलाओं को देख कर पुरुषों के मन में बेटी-बहन का भाव उत्पन्न होता था और आज के दौर जैसी सामाजिक नग्नता नहीं थी. आज़ादी कम थी परंतु अनुशासन परम था.
बस यहीं मैं ने उन्हें रुकने का कहा और उनकी इस बात पर उन्हें साधुवाद दिया और दर्द के साथ कह दिया कि आज आजादी ज़्यादा है परंतु अनुशासन कम है.
दर्द से उन्होंने अपना सिर सहमति से हिलाया और फिर हम उनकी बीमारी के संबंध में चर्चा पूर्ण की.

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