कभी तो ये ससुरा दौड़ लगाएगा और मेरे इन्वेस्टमेंट डिसीज़न को सही साबित करेगा!
शेयर बाज़ार में अपनी होल्डिंग को आज देख रहा था तो कुछ प्रथम श्रेणी के शेयर मुनाफ़े के साथ गर्व के साथ सीना ताने खड़े थे तो अधिकतर द्वितीय श्रेणी के शेयर घाटे में बेशर्मी के साथ सिर ऊपर परंतु निगाह नीची किए खड़े थे. वहीं कुछ कंपनी के शेयर, निर्विकार निर्लज्ज और आलस्य भाव से पीड़ित हो सालों बाद भी उसी ख़रीद भाव पर ही रुके पड़े होकर टुकुर टुकुर मुझे ही तक रहे थे. ये तृतीय श्रेणी के हैं.
मेरे शेयर (के बच्चों) को देखते देखते सोचने लगा कि जीवन के संबंधों में भी कमोबेश यही चित्र प्रस्तुत होता है. उंगली पर गिने जाने योग्य रिश्ते-नाते और मित्र फ़ायदे के हैं जो दिन में या रात में अपना सहयोग का कंधा या सुधि सलाह दे सकते हैं. बाक़ी के रिश्तेदारों, मित्रों, यारों, दोस्तों, सहेलियों की श्रेणी दूसरे और तीसरे श्रेणी के स्तर पर स्थित होती है.
शेयर बाजार में भी आपके पोर्टफोलियो के शेयर रूपी बच्चों से घाटे में बने रहने के बाद भी यह उम्मीद बनी रहती है कि कभी न कभी तो ये बच्चा जवान होगा और मेरे लिए लंबी दौड़ लगाएगा और मेरी आर्थिक स्थिति की नाव पार लगायेगा. उसी प्रकार की उम्मीद मित्रों से सदैव बनी रहती है कि कभी न कभी तो ये नकारा भी काम आ जाएगा.
स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड कंपनी के आपके द्वारा ख़रीदे गए शेयर्स आपकी इच्छा अनुसार अपने दुगुने भाव पर न पहुँच पाने के ये शेयर्स ऐसे ऐसे बहाने बनाते हैं कि आपको अपने आप पर दया आ जाए, जैसे मैं तेज दौड़ नहीं पाया क्यूँकि
इस बरस मानसून में कम बारिश हुई,
तो कभी विदेशी मामले में संबंधों में खराश है
तो कभी विदेश में युद्ध का बहाना
तो कभी युद्ध जैसी अंतराष्ट्रीय परिस्थिति.
तो वहीं सरकार की इंडस्ट्री विरोध की नीति
याने कहने का तात्पर्य यह है कि हर शेयर की अपनी एक विचित्र कहानी है.
कहीं कंपनी के टर्नओवर अच्छा होने के बावजूद लाभ की स्थिति विपन्न है तो कहीं कोई कंपनी के शेयर ख़राब टर्न ओवर होने के बावजूद प्रॉफिट अच्छा है. पी ई, बीटा, अल्फा, बुक वैल्यू और अनंत प्रकार के फैक्टर के माध्यम से टेक्निकल एनालिसिस के माध्यम से शेयर की ऊपर की और जाने वाली चाल को समझने की कोशिश की जाती है और कई बार आपके शेयर के खरीदने का निर्णय नतीजा शून्य.
वही हाल चाल मित्र का है जो जरूरत के समय पर क्या जवाब दे कहना जटिल प्रश्न बन खड़ा होता है.
कि मैं तो शहर में था ही नहीं
मेरा स्वास्थ्य ख़राब था भाई
मेरे घर में ही गमी हो गई थी
भाई पहले बताता तो मदद हो जाती अभी तो संभव नहीं है
याने तात्पर्य ये है कि भरोसे की भैंस पाड़ा ही जनती है ऐसी पुरातन कहावत है. याने जिस पर भरोसा किया जाए वह विश्वास का धोखा न दे यह अधिकतर संभव है.

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