इतना विष लाते कहाँ से हो!

Spewing Venom

तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे फ़ोन करने की !
मैं तुम्हारी नौकरी को नर्क बना दूँगा !
तुम किसी काम के नहीं हो !
तुम्हारी कामचोरी अव्वल दर्जे की है !
तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता है !
तुम नकारा हो !

जैसे वाक्यों से पीड़ित एक शांत कर्मचारी ने एक दिन भगवतगीता पाठ किया और उसे समझ आया कि इस तरह के नकारात्मक वाक्यों की अवहेलना की जाना ही एकमात्र उपाय है और मस्तिष्क को धनात्मक सोच के साथ सकारात्मक एवं अच्छी भावना और सोच से पालन पोषण करना चाहिए.

यह कर्मचारी एक कर्मठ, कौशल से भरपूर और गंभीर कार्य करने वाला कर्मचारी है परंतु अधिकारी तो अधिकारी है.
यदि किसी अधिकारी को यह प्रतीत होने लगे कि यह मातहत अच्छा तो है पर इतना अच्छा क्यों है कि मुझे प्रतियोगिता दे सकता है?!!!
या मुझे इतना अच्छा क्यों नहीं आता है तो आत्ममंथन कर अधिकारी इस तरह के वाक्यों के उत्पादन करने लगता है

परंतु जो समझदार कर्मचारी हो वह इस बात को जानता है कि-
मुझे मेरे काम से मतलब है
मुझे मेरे क्रोध को नियंत्रण करने से मतलब है
मुझे मेरे आत्म सम्मान की रक्षा से मतलब है
मुझे मेरे उस मानस से संबंध है जिसमें दोसरो के प्रति बुरे विचार लेन की मुझे संस्कार विकसित हुआ है मुझे आप भला तो सब भला जय वाक्य में विश्वास है मुझे कर्म के फल के सिद्धांत पर विश्वास है
मुझे बुरा कर बुरा होगा आचा कर रहा होगा पर विश्वास है
मुझे ईश्वर की परम सत्ता पर विश्वास है
मुझे न जाने क्यों अपनी आप पर विश्वास है

परंतु एक दिन तो ग़ज़ब हो गया जब भर मीटिंग में अधिकारी ने कर्मचारी को केवल भला-बुरा कहा बल्कि तेज आवाज़ में अपमान भी किया. यह बड़ी कठिन परिस्थिति थी जब कर्मचारी उत्तर भी देना चाहता था, क्रोध से भरा हुआ था परंतु संस्कार, बिपश्यना के प्रशिक्षण और गीता -पाठ के छात्र होकर अपनी सुधि मानस भाव और विचार शृंखला को नियंत्रित रख के खड़े होकर जो बोला जिस के बाद दृश्य ही बदल गया. सन्नाटा कुछ तरह पसरा कि साथी कर्मचारी तो मुस्करा दिए परंतु उस अधिकारी मानस देखने योग्य था यह सुनने के बाद

कि सर आप इतना विष लाते कहाँ से हो ???

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