मेरी फाँस

फाँस लकड़ी अथवा बाँस की वह छोटी से छोटी छिलपट होती है जो पैर या हाथ की त्वचा में धँस जाए तो दर्द और चुभन से निरंतर अपनी उपस्थिति को न केवल अंकित करती चलती है बल्कि जातक को बेचैन कर देती है कि कैसे इस फाँस से मुक्ति पाई जाए !!

कुछ फाँस ऐसी भी होती है जो अंतरात्मा में धँस जाती है और निरंतर क्लेश कर हुए अपनी चुभन से मन-मानस को आंदोलित करती चलती हैं.

उदाहरण स्वरूप महाराणा प्रताप प्रतिमा के चौराहे को नगर का आम आदमी सम्मान देते हुए महाराणा प्रताप चौराहा न कहते हुए काला घोड़ा चौराहा कहता है. उसी प्रकार वीर सावरकर चोराहे की पहचान जंजीरवाला चौराहे से आम और खास में बनी हुई है.

यह फाँस ऐसी विचित्र है कि जब भी इन दिवंगत हुतात्मा के नाम पर रखे चौरस्ते से निकलो तो हमारे पूर्वजों के त्याग बलिदान संघर्ष की याद को सहर्ष भुलाते हुए हम इन महानायकों के नाम को भी भुला देते हैं.

जो सम्मान हमारे पूर्वजों के प्रति उत्पन्न होना चाहिए और सदा स्थापित होना चाहिए वह एक साधारण नाम से याद रखें जाने पर जो पीड़ा होती है वह किसी फाँस की तरह ही है जो कि एन केन प्रकारेन नहीं यदा-कदा नहीं बल्कि निरंतर ही अपनी चुभन और दर्द के साथ उपस्थित होती है !!

विचार कीजिए

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