हॉलीवुड के चलचित्रों में प्रयोग, नवाचार और पुरातन पंथी विचारों से अलग होकर सोचने की प्रवत्ति उन्हें नए नए विषय पर चलचित्र बनाने के अक्सर प्रदान करती है यह प्रयोगधर्मिता तब और भी रुचिकर और रोमांचक हो जाती है जब जैक निकलसन और मॉर्गन फ्रीमैन द्वारा अभिनीत “द बकेट लिस्ट” की अभिनव कथानक के माध्यम से अस्पताल में अंतिम दिनों की इंतज़ार कर रहे एक धनाढ्य व्यवसायी तथा एक मध्यम वर्ग मैकेनिक के जीवन भर की संजोई आकांक्षा सूची (Wish List) को पूरा करने की एक अद्भुत अद्वितीय विचार आता है.
आकांक्षा-सूची वह होती है जिसे आप अपनी बचपन से आपने अपने मन में संजोये सपनों को पूरा करने की कामना करते हैं कि जब कभी भविष्य में पैसा होगा, स्वास्थ्य होगा, जलवा होगा, सुविधा होगी तब मैं यह कार्य करूँगा.
धीरे धीरे वह आकांक्षा सूची जीवन की आधा-धापी में किनारे होती जाती है. इस चल चित्र की खूबी यही है कि इन दोनों बुज़ुर्ग नए नवेले मित्रों के पास ऐसी बीमारी है जिसमें दोनों की ज़िंदगी का समय ज़्यादा बचा नहीं है लेकिन अस्पताल के ट्विन – शेयरिंग बिस्तर पर लेटे धनी रोगी ने पड़ोसी रोगी साथी की आकांक्षा सूची पढ़ ली और बस वहीं से कहानी ने वह मोड़ लिया जो केवल आश्चर्य चकित करता है बल्कि आंदोलित भी करता है , सोचने पर मजबूर करता है.
इस चलचित्र में एक शब्द प्रयोग किया गया मृत-धन अर्थात् जो धन आप छोड़कर जाने वाले हो उस की उपयोगिता आपके लिए शून्य है. संदेश भी उत्तम है कि जो धन आपने आपने ऊपर खर्च कर लिया वही आप की धरोहर है, पूंजी है, संपदा है.
अनिवार्य रूप से यह देखने योग्य मूवी है.

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