ये जुमला बचपन से सुनते चले आए और उसका पालन भी करते आए कि “लेडीज फर्स्ट” को वरीयता दी जाए. और इसी नाम की एक अंग्रेज़ी चलचित्र (नेटफ़्लिक्स- डब्बड हिंदी भाषा में भी उपलब्ध) के देखने का सौभाग्य हुआ.
पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों की श्रेष्ठता की हेकड़ी, दंभ और घमंड उन्हें सामाजिक रूप से उच्चतर श्रेणी पर क़ायम रखने में मजबूर तो करता ही है परंतु स्त्री को कमतर मानने की प्रवृत्ति भी स्थापित है. परंतु कैसा परिदृश्य हो कि जब सामाजिक दृश्य का आमूल चूल पलटा हो जाए याने नारी प्रधान सामाजिक परिदृश्य हो जाए.
ऐसो ही कुछ, एक घटनाक्रम के पश्चात इस चलचित्र में हुआ जब पूर्ण सामाजिक व्यवस्था और प्रतिष्ठानों की कमान स्त्रियों के हाथ में आ गई इतनी आ गई कि पुरुषों को कुछ इस कमतर स्तर पर समझा और उतारा गया कि गाड़ी के पंचर पहिए के बदलने के कार्य भी स्त्री द्वारा ही किया गया और पुरुष की कमज़ोर स्थिति को ना केवल उसे प्रकाशित किया गया बल्कि पुरुष प्रधान समाज की महिमा को भंगुर भंगुर किया गया. डेजा वू के कई उदाहरण बड़े ही रोमांचक रूप से पिक्चराइज़ हुए हैं
मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO)बनने की कोशिश में रोचक घटनाक्रम की रोमांचक प्रस्तुति इस चलचित्र की मुख्य उपलब्धि है और रोमांचक दुर्घटनाओं से चलचित्र के देखने में एक लयबद्ध अनिवार्यता बनी रहती है. इस चलचित्र को देखने की सुख भिन्न है और उस समाज की अवधारणा को क्षतिग्रस्त करता है जहाँ पुरुष प्रधान या नारी प्रदान परिवार अथवा समाज व्यवस्था की वकालत की जाती है. सच तो ये है कि दोनों एक दूसरो के पूरक हैं और मेरिट के आधार पर ही प्रतिभा को आगे बढ़ने के मोका दिए जाने के संदेश सारगर्भित है उचित है और दिल को छू जाने वाला है.

Leave a comment