जीवन के सबक हर व्यक्ति के दिन और रात के पाठ होते हैं और सुधी व्यक्ति अपनी जीवन के सीखे हुए सबकों से ही नहीं सीखता बल्कि दूसरों से सुने उदाहरण से भी सीख लेता है.
एक बार एक बैंक में क्लर्क की भर्ती हो रही थी तो इंटरव्यू अधिकारी थक गए तो उन्होंने एक अभ्यर्थी से मनोरंजन भाव से प्रश्न किया कि अपनी एक अच्छी आदत बताओ और एक बुरी आदत बताओ ?
तो प्रत्याशी पुरुष ने कहा कि सर मेरी बुरी आदत ये है कि मैं शराब पीता हूँ और अच्छी आदत यह है कि अपने पैसे से खरीदी की नहीं पीता हूँ. अर्थात् कोई अनुनय विनय से पिला दे तो राजी हूँ अन्यथा अपने एकल भुगतान पर नहीं पीता हूँ.
इस तरह के उत्तर की उस बैंक मैनेजर को आशा नहीं थी परंतु उन्होंने उस प्रत्याशी को चयन कर लिया.
देखने को तो यह छोटी सी बात दिखाई पड़ती है परंतु किसी भी आदमी के बुरी आदत के लत बनने में कोई देर नहीं लगती और यदि जब वह शराब या किसी नशे के पदार्थ से संबंधित हो तो यह इस लत को आगे बढ़ने से रोक पाना लगभग असंभव ही होता है.
परंतु यह नियम अगर पालन कर लिया जाए कि मैं अपनी पैसे की खरीदी शराब नहीं पियूँगा तो इसके मौके बहुत कम आयेंगे साल भर में जब कोई आपको दारू सेवन करने के लिए बुलाये और बिठाए, आपके अपर पैसे खर्च करे.
इसी प्रकार एक बड़ी सरकारी परीक्षा में इंटरव्यू और उत्साही प्रत्याशी से प्रश्न किया कि क्या आप शराब पसंद करते हैं ?
बोले, जी हाँ सर, परंतु अपने पैसे की ही पीता हूँ.
यहां विरोधाभास तो है परंतु भविष्य में भ्रष्ट आचरण की कम संभावनाओं को देखते हुए इसी बात पर उस बच्चे की सिलेक्शन हो गया. तात्पर्य यहाँ पर ये था कि यह बालक इच्छा शक्ति का धनी है और इस सिद्धांत का पालक है कि कोई भी मुझ पर दबाव डाले तो में उस दबाव में आकर शराब नहीं पिऊँगा जब भी पिऊँगा और शराब की पेमेंट मैं ही करूँगा.

ये दोनों ही बातें शराब के संदर्भ में इसलिए कहीं गई है कि दोनों ही स्थितियों में बुराई को गले लगाने से पहले उनका खुराक की मात्रा निश्चित कर लेनी चाहिए ताकि
गलती होने ना पाए
लत लगने ना पाए
बर्बाद होने ना पाए
परिवार नाश होने ना पाए और
चरित्र हनन होने ना पाए
ब्लॉग में ख़ुशी मिली हो तो लाइक कीजिए, टिप्पणी भी दे सकते हैं.
Leave a comment