लिखाड़ी की उड़ान और पुस्तक प्रकाशन में शोषण

आप तो अच्छा लिखते हैं और आज आपका लेख अख़बार में छपा है और बड़ा ही उत्तम है!

एक पड़ोसी ने अपनी लेखक पड़ोसी से यह बात कही. लेखक पड़ोसी ने आभार व्यक्त किया तो पाठक पड़ोसी ने कह दिया कि आप अपनी आलेखों कविता और कहानी का संग्रह क्यों नहीं छपवाते हैं तो लिखाड़ी पड़ोसी गर्दन झुककर घर में अंदर चले गए.
पड़ोसी को थोड़ा सा अजीब लगा परंतु यह सोचकर कि लिखाड़ी लेखक लोग थोड़ा संवेदनशील होते हैं कहीं बुरा न लग गया हो, सोचकर प्रशंसक पड़ोसी भी अंदर चले गए वह से एक विचार शृंखला आरंभ हुई और चलने लगी.

कहा गया है कि दो आविष्कार बड़े जबरदस्त हुए जिन्होंने आधुनिक मानव की सामाजिक व्यवस्था को बदलकर रख दिया. पहला तो है पहिए का आविष्कार जिससे दूरी तय करना आसान हुआ और दूसरा है भाषा की विकास. भाषा के विकास से संवाद संचार के वो नए आयाम प्राप्त हुए जो आज के दौर में अपने उच्चतम स्तर पर प्रतीत होते हैं.

कठिन है विचार उत्पन्न करना और उत्पन्न विचार को संजो कर, सही दिशा और दशा में ले जाते हुए सही भाषा में लिखना और भी कठिन कार्य है. परंतु पुरानी कहावत है करत करत अभ्यास से जड़ मति होत सुजान, रसरी आवज़ जावत सिल पर पड़त निशान जटिल पर बढ़त निशान अर्थात् निरंतर अभ्यास से लिखना सीखा जा सकता है और लिखने वाला लिखते-लिखते लेखक बन जाना और लेखक बन कर प्रकाशित होने योग्य लेखक बन जाना और फिर प्रसिद्ध लेखक और अंत में पुरस्कार विजेता लेखक बन जाना एक सीढ़ी दर सीढ़ी से चढ़ने की यात्रा है जो कदाचित कम लोगों को ही प्राप्त हो पाती है.

लिखना सदैव ही आसान प्रतीत होता है जो मन में विचार आए उसको लिपिबद्ध कर दिया जाए. विचार कोई भी हो, वैज्ञानिक हो, सामाजिक हो, अवैज्ञानिक हो अथवा नैतिक हो अनैतिक हो, बुरा हो अच्छा हो, पद्य हो, निबंध हो या प्रेरणास्पद नए वाक्य ही क्यों नहो परंतु किसी भी लेखक के लिए यह आवश्यक है की वह प्रिंट मीडिया में छपे और छपने के बाद पढ़ा जाए और निरंतर पढ़ा जाए और इस निरंतर पढ़ने की प्रक्रिया में लेखक अपनी लेखन के प्रयोग से साक्षात्कार करता है. अपनी कल्पना और परिकल्पना के घोड़े दौड़ाते हैं.

कुछ कहानी तो कुछ कवित्त, कुछ राजनीतिक निबंध और कुछ आलोचनातमक टिप्पणियों के साथ साथ पुस्तकों और चलचित्रों की समीक्षा में भी अपनी हाथ आजमाये रहता हैं परंतु किसी भी लेखक के लिए सब से महत्वपूर्ण है कि वह उसके नगर के अख़बार में छप जाए और जब अख़बार में निरंतर छपने लगे तो उसके बाद उसकी पुस्तक छप जाए और पुस्तक मशहूर हो जाए और डिजिटल प्लेटफार्म पर दिखने लगे बिकने लगे और सालाना साहित्य अकैडमी और अन्य पुरस्कार प्रदान करने वाली संस्थाओं की निगाह में आ जाए और पुस्तक प्रकाशित होने के बाद पुरस्कृत भी हो जाए किसी भी लेखक की यह अभिन्न अविस्मरणीय और चाहत भरा क्रम है.

यह भले ही अलग बात है कि कोई लेखक अपनी पांडुलिपि लेकर किसी प्रकाशक के समक्ष उपस्थित होता है तो प्रकाशक सिरे से ख़ारिज कर देता है. और हाथ पैर जोड़े जाएँ तो छपास की खुजली देखते हुए प्रकाशक लेखक से स्वयं अपने खर्चे पर छापने को कह देता है. किसी प्रकाशक या मुद्रक से संपर्क कर ख़ुद अपनी पुस्तक छपाएँ और फिर उसे मित्रों,परिवार – सदस्यों और सामाजिक वृत्तों में वायरल करें, निरंतर निवेदन करें कि वे अपने इस मिंत्र की पुस्तक ख़रीदे और पढ़ें!

बस यही से लेखक शोषण आरम्भ हो जाता है, जब तक लेखक बिना किसी स्वार्थ के लिखने को अपना पेशा नहीं बना पाता है तब तक उसका लेखन मौलिक और परीकल्पना से जनित होकर स्वयं संतुष्टि एवं समाज संतुष्टि और प्रभाव डालने हुआ होता है परंतु जैसे ही लेखक की रुचि अपनी लेखन को प्रकाशित करने और पुरस्कार करने की और झुक जाती है वह लेखन के मूल उद्देश्य कहीं भटक जाता है क्योंकि लेखन के जन्म शोषण के लिए हुआ है. लेखक मात्र अपनी प्रतिभा संपन्न रचना को बेचने के प्रयास एक प्रकाशक से दूसरे प्रकाशक के मध्य कुछ इस लक्ष्मण झूले की तरह झूलता है कि उसे माया मिली न राम की अवस्था तक पहुंचाना पड़ता है.

यदि लेखक स्वयं प्रकाशक बन जाए मुद्रक बन जाए अख़बार मालिक बन जाए तो वह शोषक हो जाएगा.
प्रकाशकों क़ा आत्ममुग्ध व्यवहार केवल लेखक का शोषण है जहां छपी हुई पुस्तकों की संख्या, पुस्तकों की बिक्री की प्रतियों की संख्या, ऑनलाइन प्लेटफार्म के मध्यम से पुस्तकों की बिक्री की संख्या और उस के विरुद्ध जमा हुए धनराशि मात्र अंदाज़ लगाएं जाने के अतिरिक्त कोई प्रयास नहीं होता है.

जहाँ तक लेखक की रियल्टी सवाल है तो प्रथम प्रकाशन में रियल्टी के प्रति कोई शुल्क देय नहीं का अनुबंध हस्ताक्षर कराया जाता है उसके बाद वह प्रथम संस्करण बिक जाए तो रिप्रिंट का विकल्प खुला है. लेखक को सूचना भी नहीं दी दिए जाने का अघोषित प्रावधान है. विक्रित किताब और रॉयल्टी तो साहब चूल्हे में चली गई है.

यह लेखक का सौभाग्य है कि वह मस्तिष्क में उपस्थित आपने ग्रे-मैटर में खाद्-पानी डाल कर लेखन की फसल उगाता रहता है और यही लेखक अपनी इस तैयार फसल को किसान की भांति प्रकाशक को जब प्रस्तुत करता है तो प्रकाशकों द्वारा हल्का माल, दागी माल, गीला माल कहकर सिरे से ख़ारिज करने के प्रयास करता है और फिर जैसा किसान का शोषण होता है उसी तरह लेखन के शोषण को अंज़ाम देते हुए कम से कम दाम में या निःशुल्क दाम में लेखन की ख़रीद कर ली जाती है.

यह स्थिति कवि, कथाकारों, निबंधकार, स्तंभकारों मात्र के लिए सत्य घटनाक्रम नहीं है बल्कि स्कूल कॉलेज की शिक्षा पुस्तकों के मूर्धन्य लेखक के संबंध में भी उतना ही सच है जहाँ हजारों लाखो की संख्या में पुस्तकों का सौदा होता है परंतु लेखक सदैव किसान की भांति किनारे पर बैठ नदी बहते देखता रहता है.

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