संवेदनशील होना अच्छा है
संवेदनशील व्यक्ति भावुक होता है
संवेदनशील होना सामाजिक न्याय है
संवेदनशील, समाज में प्रेम की धरोहर है
संवेदनशील, एकरसता का प्रतीक है
संवेदनशील, एकता की धुरी है
संवेदनशील, भावना का धनी है
परंतु
संवेदनशील का ह्रदय कमजोर है
संवेदनशील भावनाओं में बह जाते हैं
संवेदनशील बहुत अधिक भयभीत हो जाते हैं
और
संवेदनशील आत्मघात तक कर लेते हैं
अतः
संवेदनशील बस, अंतर्मुखी न होने पाए, अकेला न होने पाए…
भारतीय समाज के बच्चे बचपने से एक न एक सपने के वाहक होते हैं. डॉक्टर, आईआईटी, आईएएस, विदेश, फाइटर पायलट और वैज्ञानिक एंटरप्रेन्योर बनने जैसी कालजयी स्वप्नों के साथ वे बड़े होते हैं. जो सफल हो जाए तो ठीक.
जब असफल हो जाए तो एक विचित्र मानसिक झंझावात से साक्षात्कार कर लेते हैं और अंतर्मुखी हो सेल्फ डिस्ट्रक्शन याने आत्मघात करने को दुर्भाग्य से उन्मुख होते हैं.
आखिर कितनी डिग्री की संवेदनशीलता हम अपनी संततियों को विकसित होने हेतु ऐसी परिस्थिति प्रदान कर रहे हैं. इस कलयुग के दौर में जहाँ निष्ठा, सच, नैतिकता, संयम और धैर्य जीवन रूपी मायालोक के थिएटर में पीछे की कुर्सियों पर विराजमान हैं वहाँ हमारे ये अति संवेदनशील बच्चे जरा सी असफलता से डर जाते हैं और आत्मघात को तैयार हो जाते हैं.
इतना संवेदनशील कि जीवन में ज़रा सी भी असफलता आये तो आत्महत्या कर लें.
और आयु क्या है ऐसे बच्चों की?
ग्यारह वर्ष, सत्रह वर्ष, चौबीस वर्ष.
पढ़ते-लिखते बच्चे,
स्वतंत्र मानसिक सोच रखने वाले बच्चे ,
सुख सुविधाओं में रहते बच्चे,
परिवार की अनमोल धरोहर बच्चे,
छोटे परिवार की लगभग एकमात्र संतान बच्चे,
बड़े सपने देखते बच्चे
उदाहरण ऐसे ऐसे कि ह्रदय बस रो तो जाए.
पहला उदाहरण है एक डॉक्टर का.
मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस पास,
नीट पीजी से अस्थि रोग में चयनित,
जामनगर मेडिकल कॉलेज आबंटित,
बस दिल्ली नहीं मिला तो आत्महंता हो गए.!
दूसरा उदाहरण, नीट – यूजी के 2026 परीक्षा के पेपर लीक,
दुबारा परीक्षा होगी का आदेश ,
तो एक बिटिया ने डर से आत्मघात कर लिया
काहे का डर, दोबारा परीक्षा देने का. !!
आख़िर कहाँ से लाते हैं ये बच्चे ऐसे विकार जो विचार में वह उच्च स्तर की विकृति प्रस्तुत कर देते हैं.
आख़िर कहाँ से लाते हैं ये बच्चे ऐसी अंतर्मुखता कि इस विचार को पनपा देते हैं जो आत्महत्या को प्रेरित
कर दे.
आख़िर कहाँ से लाते हैं ये बच्चे ऐसे हीन विचार उच्च सपनों के साथ जो धनात्मक सोच के पहाड़ को एकदम से धराशायी करते हैं.
आख़िर कहाँ से लाते हैं ये बच्चे ऐसे कठोर और क्रूर और निष्ठुर निर्णय जो माँ पिता भाई बहन को भी दुख में छोड़ देने का साहस रखते हैं.
आख़िर कहाँ से लाते हैं ये बच्चे ऐसे अनैतिकता जो साहस धैर्य हिम्मत और संयम से परे हटने का दुस्साहस देती है.
आख़िर कहाँ से लाते हैं ये बच्चे ऐसे विचारों की विषमयी श्रृंखला जो परिवार, समाज, देश, को भी गिनती में नहीं रखता.
हल क्या है इस समस्या का –
- बच्चों से रोज़ संवाद कीजिए.
- संवाद हीनता को बच्चों के साथ मध्य में न आने दीजिए.
- अपने दुखी और सुखी बच्चे को याद कड़ा कहें, घबराना नहीं , मैं हूँ न.!
- उसको अपना कंधा दीजिए जब वो सफल हो असफल हो

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