सुना, तुम्हारा ट्रान्सफर हो गयाहै?
हाँ जी.
अरे कैसे? सरकारी नौकरी में तो ज्यादा ट्रान्सफर होते नहीं हैं? ऐसा ही है न !
अरे नहीं, कोई आरक्षण नहीं है, और कोई बड़ी घटना भी नहीं है. प्रशासन का मंतव्य राज्यपाल के आदेश का पालन सर्वोपरि है और नौकरी करना है तो कहीं भी करो.
फिर भी , गाँव छूट रहा है. तो निरस्त करवा लो.
वह भी एक विकल्प है, जटिल है. भतेरे लोगों के पायं-लागी करना पड़ेगा जो मेरे लिए थोडा कठिन है.
फिर क्या करोगे, जाओगे ?
अवश्य !
घर परिवार , बुजुर्ग माँ पिता, बच्चों की पढाई?
सब चलती रहेगी जैसे पहले चल रही थी , बस अपन नौकरी पर दूर रहेंगे, अभी गृहस्थी कच्ची है, सेवानिवृत्ति में समय है और निजी प्रैक्टिस अब कर नहीं पाएंगे.
तुम तो समर्पण कर गए!
जैसा आप निष्कर्ष निकाल लें?
ऐसा क्या है. तुम तो अधिकारीयों के प्रिय थे और बैलगाड़ी को खींच रहे थे. है कि नहीं!
हाँ, सही कह रहे हो मित्र, परन्तु जब आप उच्च प्रशासनिक स्तर पर पदस्थ रहो तो कुछ कड़े निर्णय शासन हित में लिए जाएँ तो कुछ सज्जन पुरुष रुष्ट भी हो जाते हैं. यही जीवन का नियम है, कहने को इसी से ऐसी सजा आती है. कड़वा कौर है व्यंजन थाल में कभी कभी आ जाता है तो उसे भी सहर्ष खाना चाहिए. है कि नहीं!
सो तो है. आपके कहने से समझ आ रहा है कि बैर भाव उत्पन्न हुआ है तुम्हारे प्रति?
स्वाभाविक है! जब आप नियमानुकूल रूप से अपने कार्य सम्पादित करते हैं तो छोटे -बड़े का असंतुष्ट होना स्वाभाविक है. मुझे कोई आपत्ति नहीं है. कदाचित नीति नियंता तो निमित्त मात्र हैं और मुझे समझ है कि समय जो करता है भले के लिए करता है. पुराना दोहा है रहिमन चुप हो बैठिए देख दिनन का फेर. गीता के अध्ययन से भी यह शिक्षा प्राप्त होती है कि सहन कीजिए, समय का चक्र सदा एक सा नहीं रहता है.
लेकिन अन्याय के विरुद्ध आवाज
तो बुलंद होनी चाहिए. अभी तीन बरस पहले ही तो तबादला हुआ था तुम्हारा. ऐसे कब तक use and throw उत्पाद बने रहोगे!
सही कह रहे हो प्रिय. यदि मैं काम का व्यक्ति हूँ तो नए परिवेश में भी काम का ही व्यक्ति हूँ जो अपनी उपयोगिता वहाँ भी स्थापित कर सकता है. अन्य शब्दों में कहूँ तो आपदा में अवसर ढूँढ सकता हूँ . सही है कि नहीं.
सो तो मैं तुम्हें पहचानता हूं. वैसे तुम लंबी छुट्टी भी ले सकते हो ?
जी हाँ. छुट्टी का लाभ तो ले ही सकता हूं यदि मैं ! श्रीकृष्ण कथित भागवत गीता के अध्याय २ के श्लोक १४ का संदेश है कि
मात्रा-स्पर्शस तु कौन्तेय शीतोष्ण-सुख-दु:ख-द:
अगमपायिनो ‘नित्यस तांस-तितिक्षस्व भारत
अर्थात्
इंद्रियों और इंद्रिय विषयों के बीच संपर्क से सुख और दुख की क्षणभंगुर अनुभूतियाँ उत्पन्न होती हैं. ये अस्थायी हैं और सर्दी और गर्मी के मौसम की तरह आते-जाते रहते हैं. हे भारतवंशी. हमें इन्हें बिना विचलित हुए सहन करना सीखना चाहिए
सही कथन है और निर्विवाद भी है परंतु इसी गीता में यह भी लिखा है कि
है:
“हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥”
भगवत गीता के अध्याय 2 का यह श्लोक 37 कहता है:
“हे कुन्ती पुत्र अर्जुन! यदि तुम युद्ध में मारे जाते हो, तो तुम स्वर्ग प्राप्त करोगे, और यदि तुम जीत जाते हो, तो तुम पृथ्वी का आनंद लोगे। इसलिए हे कौन्तेय, युद्ध के लिए निश्चय करके उठो!
सही कहा आपने आदरणीय, युद्ध अभी भी निरंतर है बस युद्ध के प्रकल्प परिवर्तित हो गए हैं. अब युद्ध तीर भाले कमान हथियार से कम लड़े जाते हैं. पटल पर वाक् युद्ध के साथ साथ विभागीय और न्यायिक स्तर पर गुत्थम गुत्था होती है.
भगवत गीता के अध्याय 2 के श्लोक 47 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।”
इसका अर्थ है: “तुम्हारे लिए केवल कर्म करने का अधिकार है, कर्म के फल में कभी नहीं। तू कर्म के फल का हेतु मत बन, और न ही अकर्म में आसक्ति रख।”
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