बैंक में लाश!

हम भारतीय नागरिक सरकारी कामकाज के मामले में ऐसे ही है चाहे वो पीएसयू में हो, सचिव भवन में हो, सचिवालय में हो, मंत्रालय में हो, संचालनालय में हो, अस्पताल में हों या ट्रांसपोर्ट की चौकी में हो या पुलिस थाना या चौकी में हो.

प्रथम दृष्ट्या उड़ीसा के बैंक वालों की माँग के पीछे यह प्रतीत होता है कि मृत व्यक्ति की लाश को बैंक तक लाना पड़ा. अंगूठा लगवाने या हस्ताक्षर या चेहरा पहचानने के लिए, पता नहीं!

परंतु आंकलन करने यहाँ पर यह समझ में आता है कि बैंक के कर्मियों ने संभवतः उस एक व्यक्ति की न तो बात सुनी और ना ही यह प्रयास किया यह जानने का कि वाक़ई उस व्यक्ति की समस्या क्या है ? या समझा नहीं पाये?

कुर्सी पर बैठे अधिकारी कर्मचारी का यह नैतिक कर्तव्य भी है कि लाभार्थी या ग्राहक से उसकी समस्या की पूर्ण जानकारी ली जाए. वस्तु स्थिति यह थी कि बैंक कर्मियों के लाभार्थी के मृत होने के प्रमाणपत्र की आवश्यकता बतायी जाने पर मृत बहन के कब्र से शरीर निकालकर बैंक में प्रदर्शित करने का यह दारुण कार्य कर लिया

यह अजीब ज़रूर प्रतीत होता होगा कि एक खिड़की या टेबल पर दिन भर में सौ शिकायती/ हितग्राही लोगों को अटेंड करते, जवाब देते, समस्या हल करते एक समय पर अधिकारी या कर्मचारी का माथा ठनक जाता है और उस ग़रीब का नंबर तभी आता है जब वह सबसे अधिक ज़रूरी बात करने को उपस्थित होती है

सरकारी तंत्र के विभिन्न विभागों में हालाँकि यह प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है कि

मस्तिष्क को बर्फ की तरह ठंडा रखो,
ज़ुबान पर गुड़ की डली रखो और
हृदय पर धीरज का आहार रखो और
फिर लाभार्थी की बात सुनो तो इस प्रकार राष्ट्रीय स्तर की ख़बर बनने का प्रश्न उत्पन्न नहीं होगा.

कहना आसान है
समझना थोड़ा कठिन है
करना उससे भी कठिन है और
सदैव ही करते रहना सबसे कठिन है

कदाचित यह भी संभव था कि यदि विस्तृत चर्चा कर ली जाती तो बैंक का एक अधिकारी घर जाकर तथ्यों एवं अभिलेखों को एकत्र कर काग़ज़ी कार्रवाई पूरी कर लेता!

खैर घटना से शिक्षा प्राप्त की जा सकती है और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो इस हेतु खिड़की के इस तरफ़ बैठे टेबल पर बैठे सरकारी /अर्ध सरकारी कर्मचारियों एवं अधिकारियों के असरकारी होने के लिए मुस्कुराहट के साथ बात करते हुए मस्तिष्क ह्रदय और भाषा में मिश्री घोल कर बात करने के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं है

विचार कीजिएगा

Red Tape

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