कल ओ.पी.डी. में 16 वर्ष के बच्चे को दिखाने उसकी माँ आई और मां ने पहला वाक्य ही कहा कि डॉक्टर साहब, मेरे बेटे का मुँह नहीं खुलता है. और देखने में वाक़ई में मछली के मुँह की तरह उसका मुँह पूरा जबड़े से खुला ही नहीं.
पहला प्रश्न ही दिमाग़ में आया कि ये बच्चा तम्बाकू-गुटका या ख़ैनी खाता है क्या?
पूछने पर माँ बेटा दोनों चुप !
मैंने मुँह खोलकर दांतों को देखा तो तम्बाकू के निशान भरपूर थे और मुँह खोलने की जकड़न अद्वितीय थी जो फाइब्रोसिस के कारण उत्पन्न हुआ था यह अवस्था कैंसर की शुरूआती दौर है जो तंबाखू से बना है.
आदते हैं, अच्छी हो सकती हैं!
आदतें बुरी हो सकती हैं!
ये आदतें कैसे शरीर में, मानस में, समाज में घर कर जाती हैं, विचारणीय प्रश्न हो सकता है. ?
कदाचित आपको याद होगा कि आज 30 बरस पहले तक भारतीय घरों में इंडियन स्टाइल टॉयलेट हुआ करती थी और ज़मीन पर बैठकर पालथी मारकर खाने का प्रावधान भी लगभग सभी भारतीय घर में प्रचलित था. समय बदला….दौर बदला और घर घर में डाइनिंग टेबल का प्रवेश हुआ और शौचघर में भी पश्चिमी कमोड सीट का अधिकार हुआ.
ये परिवर्तन मानस में इस तरह से स्थापित हो चुके हैं है कि भंडारे या पंगत अथवा विवाह संस्कार के समारोह में सजन-गोठ के खाना खाने के अवसरों को छोड़कर पालथी मारकर ज़मीन पर या गद्दी पर बैठकर की आदत छूट चुकी है. कुर्सी टेबल पर बैठकर खाना आदत बन चुका है जो मानसिक बंधन है. वहीं दूसरी ओर इंडियन स्टाइल टॉयलेट्स की सीट प्रचलन से बाहर हो चुकी है और कमोड सीट सभी घरों, होटलों, अस्पतालों के टॉयलेट में स्थापित है. इस परिवर्तित जीवनशैली से घुटनों पर दर्द और क़ब्ज़ जैसी समस्याओं में क्या परिवर्तन आया है यह शोध और भी विवाद का विषय हो सकता है परंतु आधुनिकीकरण कि यह क़ीमत चुकानी ही पड़ेगी.
उसी प्रकार धनी होते समाज में कई आदतें और पड़ी.
दर्द सहन न कर पाने की आदत
गर्मी सहन न कर पाने की आदत
ठंड सहन न कर पाने की आदत
और सुविधा भोगी हो जाने की आदत.
पिछले 10 वर्षों में शहरों के घरों में गर्मियों के समय में ए सी का प्रयोग तथापि उपयोग अत्यधिक बढ़ गया है. ऑफिस , फैक्ट्री , दुकान, शोरूम के साथ साथ घरों में भी वातानुकूलित उपकरण लगाए जा रहें हैं. प्रतिष्ठानों को ठंडा करने के साथ ऊष्मा जो छोड़ी जा रही है वहखुले आसमान को गर्म करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है. मानसिक आदत कुछ इस तरह से परिवर्तित हो गई है कि पंखे, कूलर, मटके/ सुराही/छागल का ठंडा पानी इत्यादि के उपयोग की ये आदतें छूट चुकी है.
आप मुझे आदर्शवाद से पीड़ित कहेंगे यदि मैं कहूँ कि सड़क के यातायात नियमों के पालन की आदत भी हमारी छूट चुकी है और ज़ेब्रा क्रासिंग, रेडलाइट सिग्नल, नो – एंट्री, रांग साइड , लेन पालन , रफ़्तार नियंत्रित इत्यादी मूलभूत यातायात के नियमों को पालन में हम आधे भारतीयों की आदतें छूट चुकी हैं और न पालन करने की आदत घर कर चुकी है.
आदतें सुधार जाएँ तो नैतिक बल हो
स्वस्थ शरीर तो उत्तम मन विचार हो
कुछ ऐसे सुधरें हम आत्म नियंत्रण से
अद्भुत समाज का नवनिर्माण हो

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