अक्सर यह प्रश्न उठता है कि मुझे यह मानव जीवन क्यों मिला है ?
मेरे मानव जीवन का उद्देश्य क्या है ?
मैं कितनी बार से इस प्रथ्वी पर आ रहा हूँ और मेरी आगे की यात्रा क्या है ?
कभी कभी जब आध्यात्मिक विचार पर होता हूँ तो सोचता हूँ कि
यह लीला क्यों रचाई है ?
पंचतत्व
पांच कर्मेन्द्रिय
पाँच ज्ञानेन्द्रिय
तीन तप
तीन मानवी प्रकृति
चार युग
का समायोजन कर इस पृथ्वी को कुछ इस तरह माया में रचाया सजाया बसाया गया है कि सब उलझे हैं. कुछ योग में तो कुछ भोग में तो कुछ रोग में.
माया की लीला में और जन्म और मृत्यू, कर्मफल के फलीभूत हो, आने जाने का मार्ग प्रशस्त करते रहे हैं.
उद्देश्य क्या है?
लीला का!
इस जन्म का!
इस संशय का!
कर्म का!
कुछ भी पता नहीं है किसी को भी!
फिर कभी विचार आता है कि यह लीला ऊर्जा रूपी जीवों को परम सत्ता से मिलाने और मुक्ति देने का एक माध्यम भी है क्या?
भाव को छोड़ता है. माया में लीन होने का विचार छोड़ता है. कभी ध्यान को उन्मुख लीन होने की प्रक्रिया में ईश्वर में एक हो जाएँ, एकसार हो जाए का मन भाव.
सब संभव तो सब असंभव!
मुक्ति का मार्ग जीवन के सबसे दुरूह और जटिल मार्गों में सम्मिलित हो कदाचित परंतु जीवनयापन का मार्ग भी कम कष्टदायी और कंटीले अनुभव से परिपूर्ण है परंतु जब ये विचार उत्पन्न हो जाए कि मुक्ति के लिए संघर्ष कर सकते हैं तो एक भिन्न दौर दौड़ उत्पन्न हो सकता है. इस जीव मात्र के लिए मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाली विचारों की धारा ही बदल जाती है
जब आयु अस्सी-नब्बे पर हो तब जाग्रत होना अधिक अवसर नहीं छोड़ता.
पद, व्यापार, प्रेम की सत्ता की एक मिनट की धरोहर का एक क़दम भी ईश्वर की ओर बढ़ा दिया जाए तो वो बड़े पीपल के वृक्ष पर उपस्थित अनेकानेक और करोड़ों पत्तियों के बराबर लिए जाने वाले जन्मों के पश्चात ईश्वर से मिलने की या मुक्त होने की साधना भी सफल हो सकती है. परिकल्पना हो कदाचित परंतु ये विचार आ जाए ही मोक्ष की ओर एक क़दम बढ़ाया जाए तो क्या कार्य किए जाने चाहिए?
वैसे तन की वासना , मन की वासना और मोक्ष की वासना का मन मस्तिष्क में उपस्थित होना भी मुक्ति मार्ग में बाधक तो क्या मात्र बहते रहा जाए, चलते चला जाए… निर्विकार, अकिंचन और अस्थिर.

Bahut hi umda alekh hai
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ये जीवन पूर्व कर्म अर्थात पिछले कई जन्मों में किये गये कर्म अर्थात प्रारब्ध के पश्चात् मिला होता है।मानव जन्म बहुत अधिक योनियों में से गुजरने के पश्चात् मिलता है।इन योनियों में अच्छे कर्म का प्रतिफल मानव जीवन।इस जीवन में यदि कर्म सकारात्मक हों अर्थात सेवा,दया,मददकरना, किसी का बुरा नहीं चाहना, ईर्ष्या, घमंड,गर्व, से दूर रहना।ये सभी बातें मोक्ष कि तरफ ले जाती है।और इस कलयुग में गुरु, भगवान का नाम स्मरण,जप करना,यह सतत करने पर मोक्ष कि तरफ बढ़ते हैं।वैसे आप स्वर्ग में गये कि नर्क में वो तो मृत्यु पश्चात् कितने लोग आखरी यात्रा में सम्मिलित होते हैं उसी से मालूम पड़ता हैं। क्यों कि स्वर्ग नर्क यहीं हैं। धन्यवाद।
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Very true
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