Dhaba (496)

शुद्ध देशी घी से आलोकित बाजरे की गरम रोटी,
हरी मिर्ची और लाल मिर्ची से सजी तड़का दाल, सेंगरी की सब्जी और
दही तड़का लगाके मेथी का साग
मसाला छाछ का ड्रिंक
और अंत में मीठे में बाज़रे का गुड घी के साथ चूरमा

कुछ अजीबोगरीब संगम प्रतीत होता है !

और यह देशी दावत किसी प्रीमियम रैस्टोरैंट मैं कभी प्राप्त नहीं होगी जो अपने देश के राष्ट्रीय मार्गों और राजमार्गों पर स्थापित ढाबों में उपलब्ध हो जाएं और आपको एक नए स्वाद के अनुभव से तर-बतर कर दें.

तो इस बार कुछ ऐसा ही संयोग हुआ जब इंदौर से शिरडी जाते समय समरथाल – राजस्थानी ढाबा / होटल में रुकने का अनुपम संयोग हुआ और पहली बार कुछ इस तरह की सब्ज़ियों और दालों रसास्वादन करने का अवसर मिला. आम तौर पर ढाबे कृत्रिमता और नाटकीयता से अछूते हो तृणमूल स्तर के नागरिकों को उत्तम और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने का प्रयास करते हैं जो आमतौर पर ट्रक चालकों और उनके स्टाफ के लिए होता है.

इन ढाबों पर कभी भी मोमोस, बर्गर, नूडल्,स कचौरी-समोसे जैसे भोजन प्राप्त नहीं होंगे ग्रामीण परिवेश की बाजरे की चूरमा बनाकर गुड़ और देशी घी में लबेड़ कर तैयार मलीदा (चूरमा) या शक्कर-चावल या गर्म दूध में मक्के की रोटी मीढ़ कर खाने का स्वाद आपको एक अलग ही स्तर पर पहुँचा देता है.

ढाबे पर पड़ी कुर्सियां और टेबल की बैठक व्यवस्था से बेहतर खटिया पर पालथी मारकर बैठने और पटके पर भोजन रखकर खाने का आनंद एक नया अनुभव प्रस्तुत करा देता है जो भोजन को ग्रहण करते समय ना केवल जिह्वा की स्वाद ग्रंथियों को संतुष्ट करता है बल्कि मस्तिष्क में भी संतोष की वह अनुपम अनुभूति करा देता है जिसकी कल्पना शहरी भोजन केंद्रों पर भी नहीं की जा सकती है.

कभी मौक़ा लगे तो ढाबे की दाल सब्ज़ी रोटी चावल खीर के स्वाद को चखने का प्रयास कीजिएगा. एक अलग दुनिया में खो जाएँगे आप. और जब बिल आए तो लगे अरे! इतना सा !

गाँव अभी भी शुद्ध हैं

One thought on “Dhaba (496)

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  1. वाह l पढ कर ही मुंह में पानी भर आया l पारंपरिक पद्धती से बनाया हुआ भोजन शुद्ध सात्विक तथा पौष्टिक होता है l संपूर्ण आहार l किसी भी ट्विस्ट से परे l इसका स्वाद भी बेजोड होता है l आप के थाली के वर्णन का सार है सुरूचिपूर्ण सुसंपन्नतापूर्ण भोज l

    स्वाद आ गया l

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