परमहँस योगानंद जी द्वारा 1946 में रचित पुस्तक ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ ए योगी पढ़ते समय द्वारा एक घटनाक्रम का दोहरा आकलन करने का संयोग हुआ जिसमें परमहंस योगानंद जी के पूजनीय गुरु युक्तानंद गिरि जी के एक अन्य साधक शिष्य के संदर्भ में कथानक है.
क्रोध पर विजय पाने की प्रक्रिया में इस अनन्य शिष्य का बाज़ार में सौदा करने जाने का प्रसंग हुआ तो वहाँ किसी असामाजिक व्यक्ति से उसका विवाद हो गया और उस व्यक्ति ने इस शिष्य को थप्पड़ मार दिया. एक क्षण को साधक शिष्य भी क्रोध आ गया और हाथ उठाने को था कि साधक शिष्य ने अपने क्रोध पर नियंत्रण किया और बिना कुछ कहे वापस लौट आया.
चेहरे पर चोट लगी थी.आश्रम में गुरुजी ने देखा! पूछा- क्या हुआ ?
ना नुकुर करो ने के बाद बताने पर गुरुजी युक्तानंद गिरी जी ने कहा कि
अरे तू तो निमित्त मात्र था तूने अपने क्रोध को नियंत्रित करने के फेर मैं उस व्यक्ति की स्थिति विकट कर दी है ! जाओ तुरंत बाज़ार जाओ और देखो वहाँ क्या हो रहा है ?
जब यह शिष्य बाज़ार पहुँचा तो देखा कि उस व्यक्ति की अन्य व्यक्तियों द्वारा जमकर पिटाई हो रही थी !
अब इस घटनाक्रम का मन में विचार कुछ इस प्रकार आया जैसा गुरु जी ने कहा कि
तुम तो कारण या निमित्त मात्र हो जिसके माध्यम से प्रभुलीला रची जानी थी. यदि एक थप्पड़ तुम भी मार देते तो बात वही समाप्त हो जाती तुम्हारे माध्यम से उस व्यक्ति को जो सज़ा संभावित थी, वहाँ हो जाती.
परंतु चूंकि तुम साधना की राह पर हो और क्रोध जीतने की कोशिश में ईश्वर तत्व से मुदित हो इसलिए तुम्हारे हाथों से जो न हो नहीं पाया वह प्रकृति रूपी ईश्वर को स्वयं निश्चित करना पड़ा और उस अपराधी की सजा दोगुनी हो गई.
आश्चर्यजनक
विरोध प्रतिरोध करने के प्रासंगिक क्षण यदा कदा उत्पन्न होते हैं जो विवेक पूर्ण निर्णय की कसौटी पर तौले जाते हैं

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