Trikaal Darsh

त्रिकाल दर्श-

प्रकृति के तीन गुण
सतोगुण रज व तम से
तो जातक करे राज
कर्म अकर्म विकर्म से

मस्तिष्क की अवस्था
चेतन अचेतन या रहे अवचेतन
विस्मृत रहते हम सदा
संसार क्या शरीर व अंतःकरण

चाह ऐसी कि होने को
तन मन से पुष्ट तुष्ट रुष्ट
भ्रम की माया कुछ ऐसी
संशय में द्रष्टि द्रश्य द्रष्टा

जकड़े शरीर की लीला
संतुलन का वात कफ पित्त
बनते योगी भोगी रोगी
तृष्णा मोह संसार का चित्त

इच्छा हो सत्यम शिवम् सुन्दरम
याद रहे देव, पितृ, ऋषि ऋण
परमाणु है क्षण कण मन
अनंत जो शरीर शरीरी भगवन

मानते जैसे हसीबा खेलिबा करीबा
रहते सदा साक्ष्य साक्षी साक्षात्
काल का योग संयोग वियोग
कर्मा, ज्ञान या भक्ति योग

और भोजन भोज्य भोज्या
तृष्णा मोह माया जकड़े रहते
कहने को मनसा वाचा कर्मणा

इला पिंगला सुषुम्ना में भटकते

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