जितनी देर-दूर दुनिया देखी,
छल से छलकती तो प्रेम से भरी.
किस पथ चलें का असमंजस,
या निपट अकेले की यात्रा सही.
जीव जंतु देखे-पाले सदा,
रिश्ते-मित्र ऊँचे-नीचे कहीं.
अमृत कभी तो रक्त से रिसते,
या अब अकेले की यात्रा सही.
वायु पहाड़ नदी जंगल निर्मल,
मानव स्वार्थी और मटमैले कहीं,
तू अधम का अभिमान अजब
या अपनी अकेले की यात्रा सही.
सेवा भाव का मूल जीवन,
धन की राक्षसी लालसा ऐसे बही.
तहस नहस होती यूँ सभ्यता,
या नितांत अकेले रहने की यात्रा सही.
पढ़े बहुत और बने धार्मिक,
प्रेम का पाठ पढ़े न कोई.
दंभ अहंकार से दुनिया जीतूँ,
या फिर अकेले रहने की यात्रा सही.
न जाने क्यों रची ये लीला,
साम दाम दंड भेद से रसभरी.
बिफरे हुए पागल फिरते हम,
या हमारी अकेले रहने की यात्रा सही.

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