भाग्य की कहानी…(656)

बचपन में माँ एक कहानी सुनाया करती थी कि एक राजा था. उसे तीन बेटियां थी और वह मनोरंजन के भाव से रोज अपनी बच्चियों से पूछते थे कि तुम किस के भाग्य से खाना खाती हो.

बड़ी बेटी ने बोला, पिताश्री मैं आपके भाग्य से खाती हूँ. मंझली बेटी का उत्तर भी समान था कि मैं पिताश्री आपके भाग्य का खाती हूँ. जबकि छोटी बच्ची कहती हमेशा कि पिताजी मैं अपने भाग्य से जीवन जीती हूँ और अपने भाग्य का खाती हूँ.

दौर निकल गया एक दिन पिता जी ने वही प्रश्न फिर पूछा लेकिन प्रथम दो उत्तरों से उन्हें कोई क्रोध नहीं आया लेकिन छोटी बेटी की उत्तर पर कि मैं अपने भाग्य का खाती हूँ तो

उन्हें क्रोध आ गया और उन्होंने अपनी मंत्री को बुलाकर अपनी इस छोटी बेटी को देश निकला कर दिया और बोले यह उसके भाग्य खाती है तो में इसका भाग्य इस बच्ची को इसके भाग्य पर छोड़ता हूँ और देश निकाला देता हूँ और मंत्री को निर्देश दिया कि देश की सीमा से बाहर निकलने के बाद जो सबसे पहले जो भी जैसा भी आदमी मिले उस व्यक्ति से इस बच्ची का वहीं विवाह कर देना और वहीं छोड़ कर लौट के चले आना.

छोटी बच्ची ने पिता के निर्णय को स्वीकार किया और चरण छूकर राज महल से बाहर हो गई. सीमा पार पहुँचने पर एक गंदा और मलिन व्यक्ति दिखा तो मंत्री और उनके सहायकों ने उस अर्ध विक्षिप्त व्यक्ति को पकड़कर छोटी राजकुमारी से विवाह कर दिया और उन्हें जंगल में छोड़ दिया

अपना भाग्य जान, छोटी राजकुमारी पेड़ के नीचे अपनी पति के हाथ पकड़ कर बैठ गई. सोचने लगी कि कल तक तो मैं राजकुमारी थी और आज मेरे यह हुआ. परंतु कमर कस खड़ी हो गई कि मेरा भाग्य है ये व्यक्ति और वह अपनी पति की सेवा में लग गई.

देखते देखते चार महीने गए. एक दिन उसे सेवा को देखकर एक साधु महात्मा ने अपनी अन्तर – दृष्टि से यह जानने के प्रयास किया ये स्त्री आख़िर है कौन ? तो उन्हें पता पड़ा किया कौशल राज की बेटी है और यह लड़का भी मिथिला राज्य का राजकुमार है जो किसी आप किसी श्राप के कारण इस अवस्था में उपस्थित है.

उन्होंने उस राजकुमारी को कहा कि यह उपाय कर लीजिए तो यह लड़का एक दम ठीक हो जाएगा और बताये गये उपाय के होते ही उस राजकुमार पर श्राप का प्रभाव ख़त्म हो गया और वह पागल युवक राजकुमार के रूप में परिवर्तित हो गया.

उस राजकुमार ने पूछा कि पूछा कि देवी जी आप कौन है ? उसने बताया कि मैं कौशल राज्य की राजकुमारी हूँ और मेरा आपसे ४ माह पहले विवाह हुआ है और पूरा क़िस्सा कह डाला. उसने अपनी पत्नी कहा आओ मेरे साथ.

तभी सामने से कुछ घुड़सवार आए उन्होंने अपने राजकुमार को पहचान लिया और वे राजकुमार और राज कुमारी को लेकर अपनी मिथिला देश पहुँच गये.

समय बीतता गया और राजकुमार भी कालांतर में राजा मनोनीत हुए. तब छोटी राजकुमारी बनी रानी ने कहा कि मैं अपनी माँ के पास जाना चाहती हूँ तो राजा भी साथ हो लिए. जब उनका मैके में आगमन हुआ तो पिता के समक्ष पुत्री और दामाद ने प्रणाम किया, धन्यवाद दिया पुत्री ने कि पिताजी आपने मेरा भाग्य जगा दिया. पिता ने मान लिया कि कोई भी व्यक्ति अपने भाग्य का ही जीवन जीता है और भोजन पाता है.


ऐसी कहानियों का दृष्टि पटल पर एक सुनहरा दृश्य उपस्थित होता है जब कि मानसिक पटल पर ये कहानी कालांतर में ही समझ में आती हैं.

भाग्य अपनी स्थान पर है मेहनत अपना स्थान पर है दोनों एक दूसरे के पूरक हैं. थोड़ा सा भाग्य, मेहनत की थाली में नमक जैसा प्रतीत होता है. मेहनत से भोजन की थाली कमाई जा सकती है परंतु उसे स्वादिष्ट बनाने के लिए भाग्य का अल्प नमक भी आवश्यक हो कदाचित! विचार करें

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