मैं ये सब लंबे समय से कहता चला आ रहा हूँ पिछले कुछ वर्षों से देश में अति-डेमोक्रेसी याने अति-प्रजातंत्रवादी के नए दौर से गुज़र रहा है जहाँ बिना किसी नैतिक उत्तरदायित्व के आपको कुछ भी कहने की समग्र स्वतंत्रता है.
अपशब्दों के प्रयोग के साथ कोई भी किसी भी व्यक्ति को समक्ष में सोशल मीडिया में अथवा अन्य माध्यम से किसी भी प्रकार का अनर्गल प्रलाप और परिवाद परोसने की असीम शक्तियों संचार हुआ है जिसमें ताजा युति का नवयुवक अतिशय सम्मिलित है जिन्होंने देश की जीडीपी में वृद्धि के चलते परिवार की उच्च आर्थिक स्थिति का भोग करते हुए कभी कठिन या मलिन समय नहीं देखा है.
कुछ नवयुवा, सावन के अंधे की भाँति इस परिदृश्य में विमुक्त जाति की तरह अपनी श्री-मुख से अपशब्दों की वह गंगा बहा रहे हैं या शरीर भाव भंगिमा कृत्य से जमुना बहा रहे हैं जिसे सुनना-देखना दोनों ही मानसिक रूप से पर्याप्त विकसित श्रेणी के लोगों के लिए न केवल जटिल बन पड़ा है बल्कि असंभव भी प्रतीत हो रहा है.
अति प्रजातंत्र के इस दौर में सभी छात्रों या नागरिकों को दोष देना अनुचित होगा परंतु उँगलियों पर गिने जाने योग्य इन नई पीढ़ी के युवाओं ने देश में अलोकप्रिय तथा वक्तृत्व की अपशब्द से भरी भाषा का वह उदाहरण प्रस्तुत किया है जिसे विभिन्न सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर देख पाना, सुन पाना भारतीय संस्कृति के सुधि वाहकों के लिए कसैला है.
मनोरंजन के नाम पर क्या स्टैंड अप कॉमेडी शो या फ़िल्म के मध्यम से प्रस्तुति या नाच गाने के प्रतियोगितात्मक शो हो अथवा गंभीर विषय पर कोई आंदोलन भी क्यों न हों यदा कदा ये अश्लील कदाचारों के दृश्य उपलब्ध हो जाते हैं जो निरुद्देश्य तो नहीं ही है.
दुनिया की चमक प्राप्त करने के लिए और इंटरनेट की विभिन्न आभाषी प्लेटफार्म पर पसंद के क्लिक पाने के लिए अपशब्दों के साथ साथ अश्लील भाव प्रदर्शन के माध्यम से संस्कार की दीवार को तोड़कर एक अनचाही असांस्कृतिक भावना की बाढ़ लिए चला आ रहा है.
किस क़ीमत पर? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर!
आश्चर्यजनक प्रतीत न हो भले विषैला है, घृणास्पद है, अस्वीकार्य है, निंदनीय है, भले क्षण भर को मनोरंजक प्रतीत होता हो.
ईश्वर का आभार है कि अधिकतर युवा इस बवंडर से परे हैं, सुसंस्कृत हैं और देश की उन्नति में सक्रिय योगदान दे रहे हैं.

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