परम ऊर्जा : साकार से निराकार से साक्षात्कार (651)

बिना शरीर के आत्मा की भी गति नहीं है. ऊर्जा को भी भौतिक रूप में साकार होना पड़ता है तभी निराकार भी सार्थक हो पाता है. मानव की शरीर योनी के इस अवतार में मुक्ति अथवा मोक्ष प्राप्ति का प्रयास एक सीढ़ीनुमा बैकुण्ठ धाम की यात्रा है जिसमें प्रथम सीढ़ी, साकार रूप (Physical) की विवेचना है.

साकार से जहाँ तात्पर्य शरीर के भौतिक रूप में उपस्थित होने का है वहीं द्वितीय श्रेणी की यात्रा निराकार (Metaphysical ) अर्थात् अशरीरी रूप में विचरण की है जो वायु रूप को प्रदर्शित करती है जहाँ व्यक्ति के मन में विराजित परम ऊर्जा की साधना स्वरूप की निराकार रूप में की जा सकती है.

आम तौर पर यह गलती सदैव सब से होती है कि मानव रूप में रह हुए मानव की परिकल्पना में ईश्वर के रूप की कल्पना उसी प्रकार होती है जिस प्रकार का मानव शरीर है. जो कि मानव की अल्प बुद्धि का प्रतीक है.

जीवन के निर्माण में लगे परम ऊर्जा या साधारण भाषा में कहें तो भगवान के अस्तित्व स्वरूप को परिभाषित किया जा सकना मानव बुद्धि के बलबूते से बाहर है इसलिए बुद्धिमतापूर्वक मानव जाति ने अपनी वेद पुराण शास्त्रों ग्रंथों के माध्यम से सर्वप्रथम प्रथम सीढ़ी की साकार रूप की उपासना स्थापित की.

जिस के बाद निराकार रूप है और जब अब जागृति को उपलब्ध होने को तय हो तब उस पर ऊर्जा से साक्षात्कार होना भी अवश्यंभावी है भले ही कितनी ही बार मानव को जन्म क्यों न लेना पड़े.

Leave a comment

Blog at WordPress.com.

Up ↑