मैं भी भगवान बनूं!!! (630)

भगवान को परिभाषित करना कठिन नहीं लगभग असंभव है क्योंकि भगवान की अवधारणा मूलतः भौतिक और शारीरिक अधिक है. समझ ना आने वाली अभौतिक या अशरीरी शक्ति के ईश्वरीय सिद्धांत से आलोकित हो तो भी आश्चर्य नहीं है. साकार रूप से हम अपने पूजनीय आराध्य के भक्त होते हैं. हमारे माँ पिता सबसे पहले परम आदरणीय होते हैं.

यही कथन हमारे पूर्वजों के लिए भी सत्य है जिन्होंने अपने प्राकृतिक ज्ञान बुद्धि कौशल और संस्कार से इस मानवीय सामाजिक व्यवस्था को स्थापित किया और आज वे सम्माननीय पूजनीय हैं भले वे आज से दो- पाँच हज़ार वर्ष पूर्व हुए हों. अपने सामाजिक सरोकारों और दायित्व निर्वहन कर श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्री महावीर, श्री बुद्ध, श्री गोरक्षनाथ, श्री पतंजलि, विवेकानन्द ने इस धरोहर को आगे बढ़ाया.

आख़िर क्या किया जाए कि हम और आप भी ईश्वर बनने को तैयार हों???
क्या हमें ऐसा कुछ करना होगा, सीढ़ी दर सीढ़ी!

  1. सज्जन व्यक्ति जो प्रेम और दया से दर्शनीय रूप से सज्जित हों, हम ऐसा बनें!
  2. सज्जन व्यक्ति जो प्रेम और दया से स्वयं पीड़ा तक पीड़ित हों , हम ऐसा बनें!
  3. बहुत अच्छा व्यक्ति जो स्वयं के नुक़सान पर भी सच और न्यायप्रिय हों , हम ऐसा बनें!
  4. सेवा, सत्ता, प्रेम और सदभाव से सर्व स्वीकार्य व्यक्तित्व हो महामानव हों , हम ऐसा बनें!
  5. धैर्य, कर्तव्य, न्याय और सुरक्षा के प्रथम पूज्य स्तर तक स्वीकार्य हो पुरुषोत्तम हों , हम ऐसा बनें!
  6. प्राकृतिक न्याय के स्थापना अधिकारी ईश्वर तुल्य अतिमानव – स्थूल रूप , हम ऐसा बनें!
  7. साकार/ निराकार रूप में ईश्वर रूप में प्रस्थापित -सूक्ष्म रूप , हम ऐसा बनें!

रहीम दास जी ने सज्जन व्यक्ति की तुलना पेड़ों और तालाबों से की है, जो निस्वार्थ भाव से सबकी सेवा करते हैं. व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नागरिक
यह वह नागरिक होता है जो कानून मानता है, ईमानदार रहता है, कर देता है, और अपने कर्तव्यों को समय पर निभाता है.


फिर भी ईश्वर बनेगा कौन? किस प्रकार के व्यक्ति की पदोन्नति होगी ईश्वर के पद पर. आखिर कोई न कोई तो व्यवस्था होगी जिससे आज के दौर में हमारे सर्वमान्य देवता, भगवान, ईश्वर स्थापित हुए हैं क्यूंकि ब्रह्मांड की प्राकृतिक रचना तो अनंत काल पूर्व हुई तो क्या हमारी मानव जाति के भगवान जो अभी हैं वे कब स्थापित हुए?

प्रश्न जटिल है!
उत्तर इससे भी जटिल.
ओशो कहते है हम अल्पज्ञानी साकार रूप में मानव शरीर रूप में ही अपने जैसे शरीर में ईश्वर की परिकल्पना करते हैं.
बिल्कुल सही बात है.
तो पृथ्वी पर उपस्थित विभिन्न रूपों में अरबों जीव का अपने अपने भगवान की कल्पना उनके रूप धारी शरीर में ही करना उचित होना चाहिए.

शंका का स्तर अब उच्च कोटि का है!

अवधारणा कुछ ऐसी है कि मानव शरीर वैज्ञानिक रूप से उच्चतम रचना है.


और ईश्वर की उपस्थिति का सिद्धांत साकार रूप के साथ साथ निराकार रूप को भी परिभाषित करता है. तो ईश्वर अपना रूप बदल सकता है. तो ईश्वर मात्र ऊर्जा (Energy) हुआ जो वैज्ञानिक परिभाषा अनुसार न उत्पन्न की जा सकती है न नष्ट की जा सकती है जो एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होते छाती है

भगवान श्रीकृष्ण भाषीय भागवत गीता के अध्याय २ के श्लोक २३ में वर्णित है कि-
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं: इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते हैं और अग्नि इसे जला नहीं सकती है. जल इसे गीला नहीं कर सकता है और वायु इसे सुखा नहीं सकती है.
अतः प्रतीत होता है कि शरीर का मूल तत्व अजर अमर है. ईश्वर भी अर्वाचीन है, अजर है, अमर है, अकल्पनीय है परंतु आत्मांश है

और यदि व्यक्ति दुर्जन है तो उसे तो ईश्वर बनने की यात्रा में प्रथम सज्जन बनना होगा पश्चात ही आगे का मार्ग तय होगा.

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