रोता मानव!

पैदा होते ही समय पर रोना, मानव के नवजात शिशु के लिए अनिवार्य है. बाक़ी सब मिथ्या है.! नाटक है! दिखावा है और विदा होती दुल्हन की रुदन भी रस्म अदायगी ही है! क्या ये सही है.

परंतु एक अलग तरह कारण बड़ा सामान्य है जो बिना आंसुओं के साथ रोए प्रस्तुत होता है जो हर आदमी आम या खास की विशिष्ट प्रस्तुति भी है. यह असंतोष का रुदन है जहाँ व्यक्ति अपनी स्वयंभू विशिष्टता को अपना अधिकार मान कर समाज, देश, तंत्र और प्रभु की प्राकृतिक लीला को भी आलोचना के स्तर पर पटक देता है !
आइए देखते हैं कैसे ?

जहाँ सड़क नहीं है तो सड़क को रोता है, सड़क बन जाए तो खटारा बस को रोता है कि आवागमन के लिए बस नहीं मिल रही, बस की सुविधा विकसित हो जाए तो समय पर बस नहीं आ रही है, और बस समय पर आ जाए तो बस में सीट नहीं मिल रही है…ये असंतोष रूपी शिकायत के जहरीले सर्प अपना फ़न उठाकर खड़े हो जाते हैं.

मानव को संतोष नहीं है ! गाँव में रहता है तो शहर की ओर भागता है, छोटे शहर की ओट में रहता है तो बड़े शहर की तरह भागता है. गाँव में चौड़े में घर भाता नहीं है लेकिन शहर में चौथी मंजिल पर वन बी एच के में खुश रहता है!!

हम लोगों का स्वभाव मौसम की तरह होता है पल में तोला पल में माशा. हर स्थिति में दुखी होने को राजी. हर स्थिति में आलोचनात्मक स्थिति के नोट पर .
ये है तो वो क्यों नहीं
और वो है तो क्यों है
ये है कि मई-जून के महीने में तपती प्रचंड पड़ती धूप में कनपटी पर साफ़ी लपेटे सड़क पर नापते पहिए और पैर के पंजों को लेकर सोचते हैं कि ही भगवान, बस अब तो बारिश आ जाए.

और जैसे ही बारिश की पहली बूँद पड़ी कि सड़क किनारे के पेड़ की छाव की शरण में हो गए कि कहीं भीग न जायें. पेट्रोल पम्प के शेड में घुस गए और वहाँ चार लोग बतिया रहे पड़ती बारिश देख कि

“यार बारिश के टाइम फिक्स होना चाहिए 12 बजे रात से सुबह 3 बजे तक बारिश हो जाए बात ख़त्म”.

और जो बारिश तीन महीने खूब पड़े तो कीच-कीच , पिच-पिच से परेशान होकर अंडरगार्मेंट से लेकर कपड़ों के सूखने की फिर शिकायत की एक नवा रंग ऊपर आता है. गर्मी को तपन को भूल हुए ये तपिश कुमार, सावन भादों के बाद, कुंवार के महीने में तीज तीस त्योहार उत्सव की रंगत में मस्ती से ढोल पर नाचते कूदते डांडिया करते जैसे ही ठंड पड़ना शुरू हुई शिकायत का एक नया रंग कि इस बार पहले जैसी ठंड नहीं पड़ रही हमारे जमाने में जो ठंड पड़ती थी तो हाड़ कंपा देनेवाली ठंड हुआ करती थी.

वैसे ही मौसम जैसा मानव मन की स्वभाव है प्रजातंत्र है तो अपनी ही अतिशय आज़ादी खलने लगती हैं कि अनुशासन नहीं है
सड़क पर चलना नहीं आता है
सरकार पेट्रोल डीजल के दाम कम नहीं कर रही है डॉलर के मुक़ाबले रुपए की वैल्यू गिरती जा रही है और
जिस सरकार ने जीएसटी लगा दी
370 हटा दे
नोट बंदी कर दो तो
हमारे अन्तर मन में छुपा हुआ अति सतही कंसलटेंट चाय के प्याले में तूफ़ान लाने को खड़ा हो जाता है
और जब कोई नैतिक उत्तरदायी तो दे दिया जाए तो यह आलोचना की बारिश के तूफ़ान आहिस्ते से नाली में सरक जाता है.

और जहाँ प्रजातंत्र नहीं है वहाँ के हालात देखने को आदमी राजी नहीं है कि कितनी बुरी परिस्थितियों में जीवन यापन हो रहा है.

मानव स्वभाव है जिस हाल में रहता है उस हाल में दुखी रहना चाहता है चाहे वह साइकिल पर ऑफिस जाता हो या प्रीमियम कार में बैठकर ऑफिस जाता हो. जो श्रमिक साइकिल पर जा रहा है वो धन की कमी से जूझ रहा है और जो कार से जा रहा है वो ट्रैफिक में जाम की अधिकता से जूझ रहा है. दोनों की झुंझलाहट लगभग समान है.

जटिल है, अनुशासन के पालन करना है
टैक्स भुगतान करना है
वोट डालने जाना है.
सरकार की हो तो अमुक की है तो अच्छी नहीं है और द्रमुक की हो तो बुराई करना है और समुद्र की हो तो बदलना है. लेकिन आम जनता को उत्तरदायित्व का वहन-निर्वहन नहीं करना है !

हमरा यह सोच भारतीय भावी अकेले मात्र में नहीं है बल्कि यह परिदृश्य वैश्विक स्तर पर देखा जाता है इंसान स्वभाव है जो हर स्थिति में दुखी रखने के मौके ढूँढ लेता है और उसी को अपना कंफर्ट ज़ोन मान लेता है

किसी भी व्यक्ति के कार्य करने में कोई सहयोग होने के बाद भी पाने की उम्मीद 100 सोने के सिक्को की है और शारीरिक मानसिक या आर्थिक सहयोग एक दमड़ी का नहीं करने का मन है. लाख रुपया इलाज में खर्च केआर देगा बीमार परंतु स्वस्थ रहते समय अपने शरीर कि ध्यान नहीं रखेगा मानव. डॉक्टर बोलेगा तो तंबाकू छोड़ेगा, योगा करेगा, पौष्टिक घरेलू भोजन और हरी सब्जियां फल इत्यादि का सेवन करेगा अन्यथा नहीं.

कल तक घर में गाड़ी नहीं थी, आज गाड़ी चलाना है तो सड़क का टोल देने में आनाकानी है. आज गाड़ी है तो पेट्रोल महंगा है, तो पब्लिक ट्रांसपोर्ट से जाना नहीं भाता है. सरकारी अस्पताल में जाना नहीं और कॉरपोरेट हॉस्पिटल लूट की दुकान का ताना है.

एक्सीडेंट हो जाए तो सड़क को दोष देता है, ट्रैफिक को दोष देता है अस्पताल में उपचार में देरी हो जाए तो डॉक्टर को दोष है मौत हो जाए तो अस्पताल में तोड़ फोड़ देता है और कोर्ट में केस लगाकर मुआवजे की माँग करता है परंतु अपनी स्वयं की सुरक्षा के लिए एक हेलमेट प्रयोग नहीं करता है जिससे मौत तक को टाला जा सकता है!

सेहतमन्द हो मानव तो नशेमन हो विषैले तत्वों को आगोश में लेने के लालच में सेहत मलिन कर लेता है फिर एलोपैथी, आयुर्वेदिक और प्राकृतिक चिकित्सा के चक्कर लगता है. पुरातन खेल कूद जो खेत में मैदान में बारिश में धूप में पसीना बहा देते थे वे खेल अब एसी चैम्बर में बैठकर पी एस ५ पर या ज़ोम्बीस के साथ खेल लिए जाते हैं

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