यात्रा तो पृथ्वी की है
बना लो अनुपम स्वर्ग
कर्म अपना निर्णय कर
या बना लो दर्द का नर्क
यात्रा सात समुंदर की है
बना लो सुंदर जीवन
अनुशासन प्रेम दया से
या बना लो दर्द का नर्क
यात्रा तो पंचतत्व की है
बना लो हरा भरा मैदान
सदस्यता से रहे भरपूर
या कष्ट अहंकार का नर्क
यात्रा तो सद्भाव की है
हरेक को बना लो मित्र
हँसो खेलो कूदो शरीर से
या ईर्ष्या से बना लो दुश्मन
यात्रा तो भातृत्व की है
चाहो तो बना लो कृष्ण
जहाँ कौरव पांडव लड़ मरे
तो राम के भाई रहे संतुष्ट
यात्रा तो आत्मा की है
शरीर दर्द से भंगुर मात्र है
जीवन के बाद नया जीवन
सीखता सदा बन छात्र है
यात्रा तो सेवा की है
माँ पिता की कर लो
जो स्वार्थ में आकंठ धंसे
तो बना लो दर्द का नर्क

Leave a comment