सर्वस्व समर्पण (619)

भगवान तुल्य बौद्ध से सम्बंधित कहानियाँ बचपन में पढ़ी कहानियाँ एक विभिन्न स्थान रखती है. एक घटनाक्रम में गाँव-गाँव से गुज़रते हुए बुद्ध को सभी गांववासी अपना कुछ न कुछ श्रद्धास्वरूप समर्पित कर रहे थे. कोई सोने का कटोरा, कोई शॉल, कोई छड़ी, कोई जूते या कुछ न कुछ परंतु वे किसी भी भेंट को नहीं देख रहे थे, न ले रहे थे और आगे बढ़ते जा रहे थे सब कुछ छोड़ते हुए.

परंतु गाँव के बाहर एक झाड़ की आड़ में छुपी एक महिला जिसके शरीर पर मात्र एक साड़ीनुमा वस्त्र था, ने अपना वह एकमात्र वस्त्र ही भगवान बुद्ध को दयावश और श्रद्धावश समर्पित कर दिया. यह देख उस वस्त्र को उन्होंने माथे से लगा लिया और बोले कि लोगों ने सब कुछ दिया लेकिन सर्वस्व तो इस समर्पित महिला ने ही दिया. ये नैतिक कथाक्रम ह्रदय विदारक है.

उस दौर में इस कथानाक का मर्म समझ ना आया कि सर्वस्व क्या होता है ? परंतु एक नए घटनाक्रम में ३ मित्रों के बीच दर्ज हुआ इस संवाद से बौद्ध की यह नैतिक कथा की स्मृति हो आई जहाँ एक मित्र अपनी दोनों खड़े मित्रों के पास जाकर कहता है कि मुझे कुछ पैसे की जरूरत है, कुछ मदद कर दो.

एक मित्र ने उसे जेब से सौ नोट निकाल कर देते हुए कहा कि मेरे पास सौ रुपए ही है और यह ले लो. वहीं अन्य मित्र ने जेब से 10 हज़ार की गड्डी में से 2 हज़ार रुपए दे दिए यह देखकर मांगीलाल मित्र बड़े खुश हो गए और भावातिरेक ह्रदय से धनी मित्र से कहा कि मैं आपके 2000 जल्द ही लौट दूँगा.

इस पर 100 रुपए देने वाले मित्र ने कहा कि मेरे 100 रुपए कब लौट आएगा तो उस ने कहा 100 रुपए तो ये ले ले. मैं 19 सौ से काम चला लूंगा. और इस प्रकार सर्वस्व देने वाला प्रथम मित्र अपमानित हो गया.

घटनाक्रम साधारण प्रतीत होता है परंतु बुद्ध की कहानी से कतई अन्तर नहीं है. एक मित्र जिस के पास मात्र सौ रुपए का एक ही नोट था उसने अपनी मित्र की मदद में अपना सर्वस्व सौ रुपए देकर की. मित्र ने बड़ी रकम प्राप्त होते ही इस सर्वस्व त्याग का तुरंत त्याग कर दिया.

जीवन के विभिन्न दौर में से गुज़रते हुए बड़ी देर से यह समझ में आता है कि जो आपके लिए सर्वस्व न्योछावर कर देता है, चाहे वह माता- पिता हो, भाई हो, पुत्र-पुत्री हों, पत्नी हो, बहन हो या अन्य कोई मित्र या रिश्तेदार हो उस सर्वस्व न्योछावर करने वाले व्यक्ति के त्याग की कोई कीमत नहीं होती है और उसे “सदैव मिला हुआ ही (Taken for Granted)”समझा जाता है. जीवन के हर मोड़ और क्षण में इस तरह के सर्वस्व समर्पित करने वाले लोगों से साक्षात्कार तो होता ही है परंतु उनके सम्मान की क़ीमत नहीं होती और वे यदाकदा नहीं निरन्तर ही अपमानित होते होते हैं.

इसलिए आज कल अंग्रेज़ मानस के आधुनिक बच्चे अपनी उपलब्धता को सीमित बनाकर रखने की सलाह पालन करते हैं और सर्वस्व न्योछावर करने जैसी बातों से दूर बने रहते हैं और इसलिए संभवता आज कल विवाह संस्कार की स्थापना में कमी देखी जा रही है और विवाह की संस्था से भरोसा टूटा जा रहा है क्योंकि अपना सर्वस्व त्याग की भावना का नितांत अभाव होता जा रहा है

विषय कठिन जरूर लगे परंतु विचार अवश्य कीजिए

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