एक दौर था जब शादी के लिए जब घर परिवार में भाई – भतीजे, मामा – चाचा या उनके बच्चों की शादी के लिए गाँव जाना होता था तो खेलकूद और खानपान की मस्ती के साथ विवाह संस्कार की रस्म रिवाजों से भी साक्षात्कार हुआ करता था जिसमें मंडप छाने के बाद हल्दी की रस्म में जो छापे लगाने की रस्म होती थी उस की दौड़भाग का बड़ा ही रस होता था.
और उसके बाद दूर गांव से आई बारात के आने पर जो महिलाओं के द्वार- चार के बाद भोजन करने समय बारातियों का स्वागत जिस अद्भुत देशी बोली के अपशब्दों से भरी हुई भाषा के साथ किया जाता था वह पूर्ण देसीपन एक अनमोल झलक हुआ करती थी.
दूल्हे और दुल्हन के फेरों के दौर में एक बड़ी रस्म होती थी जिसे पैर- पूजाई कहा जाता था. ऐसो माना जाता है कि जब अग्नि के चारों और फेरे लिए जाते हैं तब दूल्हा विष्णु रूप में तथा दुल्हन लक्ष्मी रूप में उपस्थित होती है और उनको सम्मान देने के लिए गाँव के समस्त छोटे-बड़े, बच्चे – बूढ़े, समस्त रिश्तेदार, मित्र गण पैर-पूजाई की रस्म में दूल्हे और दुल्हन के पग पघारते थे, छूते थे और अपनी समर्थ अनुसार एक भेंट रकम भी समर्पित की जाती थी.
यह पैर पूजाई की रस्म अभी भी उत्तर भारतीय परिवारों में इतने आधुनिकीकरण के बाद भी देखी जाती है और इसका बड़ा महत्व है
फेरों की रस्म के बाद अगली सुबह विदाई के पूर्व कुँवर -कलेऊ याने घर के नव विवाहित दामाद के लिए सुबह के नाश्ते की रस्म होती है. यह विवाह के घर में मंडप क्षेत्र में उत्सव जैसे माहौल में संपन्न होने वाली पवित्र परंपरा है. घर परिवार मित्र अपनी और से सुबह दामाद जी को मान मनुहार से मिठाई और नाश्ता कराया जाता था और उसके साथ में उपहार में घड़ी, नगद, सोने की चैन, साइकिल और अन्य छोटे मोटे उपहार भी दिए जाते थे. कुँवर-कलेउ के आकर्षण होते थे सह-बोला जो दूल्हा जी के भांजा -भतीजे, मित्रों के बच्चे, रिश्तेदार के बच्चे हुआ करते हैं उन्हें भी कुछ कुछ पुरस्कार नगद आदि प्राप्त होते हैं. और ख़ुशी के माहौल में जबरदस्त हंसी और ठठा का माहौल होता था.
जहाँ बाहर शामियाने में दोनों पक्ष के बुजुर्ग छाती-पान जैस रस्मों को पूर्ण कर रहे होते थे. लड़की के मामा विदाई के समय उसे गोदी में ही उठाकर पालकी तक ले जा कर विदाई करने की रस्म पूरी कर रहे होते थे.
गांव की विदा होती दुल्हन का रोना इतना मर्मान्तक तक होता था कि दुल्हन के छोटे बड़े भाई बहन माता पिता सब मुँह दबाकर रो रहे होते थे
आज के इस आधुनिक दौर में जब विवाह संस्कार एक कैलकुलेटेड इवेंट हो गया है और मैनेजमेंट की तरह लेडी संगीत, फूलो की होली के रूप में हल्दी के आयोजन, पुरातन वैवाहिक रस्मों को नए कलेवर में प्रस्तुत किया जाता है वह आश्चर्यजनक जरूर लगता है परंतु समाज में स्वीकार भी है.
लड़के की बारात के रूप में ट्रेक्टर की ट्राली या बस द्वारा परदेश रवानगी के बाद घर में छूटी महिलाओं के बीच एक नाटक आयोजन होता था जिसे खुइया कहते हैं. इस रोमांचक और मनोरंजक नाटक में कोई एक महिला पुरुष का भेष धरकर दूल्हा बनती है और एक महिला उसकी पत्नी. और जो नाटक – नौटंकी होती थी उसका नितांत भाव आज के दौर में लुप्त प्राय है.
चूँकि पहले विवाह संस्कार कम उम्र में हो जाते थे तो बच्चियों को पर्याप्त रूप से वयस्क तत्व प्राप्त होने के बाद विदाई करना एक विशेष आकर्षण बिंदु थी जहाँ विवाह संस्कार होने के छे महीने एक साल दो साल बाद गौने की रस्म होती थी जब दुल्हन स्थायी रूप से आपने ससुराल में जाने के लिए बाध्य हो जाती थी और मायका सदा के लिए छूट जाता था
अब रात्रिकाल फेरों की परंपरा कम होती जा रही है और दिन में फेरों को संस्कार संपन्न होता है जिसे रोचक ढंग से पंडितों द्वार संस्कारों की पूर्ण व्याख्या करते हुए प्रतिज्ञा वचन को बहुत रुचिकर बनाकर प्रस्तुत किया जाता है जिसमें विवाह संस्कार रोचक बन जाता है हालांकि दो दिन के या धरमशाला या होटल में विवाह संस्कार के कार्य को आयोजित होने से मंडप के चारों और होने वाली गतिविधियां हल्दी के छापे, छाती-पान इत्यादि रस्म नेपथ्य में चली गई है. फलदान या तिलक के साथ महिला संगीत और प्रीति भोज के आयोजन बड़े रूप में किया जाता है हालांकि कुछ परिवारों में विवाह के एक दिन पूर्व या बाद में आफ्टर पार्टी आयोजन भी एक परंपरा बनता जा रहा है.


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