जब मानव सभ्य नहीं हुआ,
उसका जीवन अंदाजिया था,
तब वनोपज ही भोजन हुआ
खेत खेतिहर जैसा कुछ न था.
ज्यों समाज जब बने तब
जीवन मंथर मन्त्रवत था,
त्यों नैतिक विकास का दौर बना
पर विवाह जैसा कुछ न था.
ज्ञान बहा वेद लिखे जब
वह काल भी बुद्धि का था,
धीमा युग था शैशवकाल में
त्वरित आज जैसा न था.
समय यूँ बीता हौले हौले
भाषा विकास के दौर में
खेती होने लगी रोटी बनी
लड़ना परंतु आज जैसा न था
ख़ूब पढ़े लिखे आविष्कार किए
प्रकृति समझे मौसम गुने
पहिया बनाये भाषा सुधरे
नरसंहार के बम जैसा कुछ न था
जितना अग्रणी आधुनिक होते गए
भावशून्य निर्मम के नए माप
मानव जैसा जहरीला जीव
प्रथ्वी पर पहले कभी न था
आज सभ्यता चरम पर परम है
सैटेलाइट इंटरनेट के दौर में
हर व्यक्ति स्मार्ट हुआ प्रतीत
दया प्रेम का इतना अभाव न था

ब्लॉग में ख़ुशी मिली हो तो लाइक कीजिए, टिप्पणी भी दे सकते हैं.
Leave a comment