छोड़ने को हम राजी नहीं
एक सूत भर भी ज़मीन
और साथ कहते फिरते हम
है तो सबै भूमि गोपाल की
और तो और मौक़ा मिले
तो हड़पी ऐसे ज़मीन भी
तेरी लीला अपरंपार कहते हैं
सदा दबाई भूमि गोपाल की
हरि अनंत हरि कथा अनंता
फिर भी लड़े जड़ जोरू ज़मीन
अमरौती खाके कोई आया नहीं
दो जून की रोटी गोपाल की
दर्द अनेक करें बैचेन सदा
कम कर पाए किसी में दम नहीं
दर्द भौतिक है तो मानसिक भी
भावनायें तो बस गोपाल की
सांस आती जाती गिनी चुनी
माया वासना की दौड़ अलौकिकी
कोई जीता कोई रहा हारता
लीला तो सब गोपाल की
रिश्तों की ऊहापोह बारम्बार
कहीं आँसू कहीं मस्त मौसिकी
समय हमें यूँ ही नहीं बिता देता
वृन्दावन तो सदा गोपाल की

Like it or do register a comment!
very nice sir ji
LikeLiked by 1 person