सत्य और बाघ – क्या एक समान हैं?
सत्य से सब डरते हैं!
तो बाघ से भी सब डरते हैं! सत्य राजा है, सामाजिक व्यवस्था का तो बाघ को जंगल का राजा माने जाने के विशिष्ट कारण हैं. कदाचित इन्ही कारणों से बाघ एकांत प्रिय हैं, एकल हैं यथा दुर्लभ दर्शन हैं और कथाओं के अनमोल विषय हैं. बाघ की मानव लिखित कथाओं में नेतृत्व और पौरुष की सर्वांगीण प्रस्तुति हमारे मानस को सदा प्रीतिकर लगती है. और एक आदर्श पुरुष में हम एक बाघ के यथोचित गुण देखने का लोभ बनाये रखते हैं. इसीलिए कदाचित बाघ अपने विशिष्ट रंग विन्यास में सदैव सुंदर और दर्शनीय प्रस्तुत होते हैं, भले ही वे जंगल में स्वतंत्र विचरण करते हों या चिड़ियाघर के जंगले के क़ैद में हों.पूरा ईको सिस्टम बाघ के इर्द गिर्द भ्रमण करता प्रतीत होता हैजो कम से कम भारत में तो सिद्ध होता दिखता है.
बाघ का एक विचारणीय और झकझोर देने योग्य पौरुष का प्रतीक कथानक है जिसमें दो मित्र बाघों की मित्रता किसी कारण से दुश्मनी में बदल गई. दोनों बाघों ने अपने अपने क्षेत्र बदल लिए. परिवार भी विलग हो गए. परिस्थितिवश एक दिन एक बाघ के बच्चे पर सियारों के झुंड ने प्राणघातक हमला बोल दिया. दुसरे बाघ की उपस्थिति से बाघ के बच्चे की रक्षा कर दी. पूछा किसी ने दुश्मन बाघ के बच्चे को क्यों बचाया आपने ?
बाघ का सत्यपरक उत्तर था, हमारे बैर में बच्चों का क्या काम! मैंने आपने नैतिक कर्मों का त्याग कभी नहीं किया. मेरे सिद्धांत और न्याय के प्रति मेरे मूल्य मेरी भावनाओं से उपर हैं, सदा विजित है.
पौरुष, वीरता, कर्तव्य, सामाजिकता, प्राकृतिक न्याय और दया का भाव एक वीर मानस की बहुमूल्य सम्पदा है जो सब को उपलब्ध नहीं है. बाघ की मानिंद सत्य का विचार भी एकल विचरण कर एकांत प्रिय है, पौरुष का प्रतीक होकर, न्यायप्रिय है और नैतिकता का हामी होकर आपने सुंदर रूप में या कुरूप स्वरुप में भय सहित उपस्थित होते है.
सत्य की ही भांति बाघ की उत्पत्ति ओर उपस्थिति, प्रकृति का अनमोल उपहार है जो पारिस्थितिकीय संतुलन का अनमोल घटक है. बाघ नहीं तो जंगल में संतुलन नहीं. बाघ, चंद्रराशि निर्धारण में भी 12 राशियों के मध्य एक स्वतःस्फूर्त ऊर्जा का तत्व है जो सिंह राशि को इंगित करता है. सत्य नहीं तो सामाजिक व्यवस्था में संतुलन नहीं.
सिंह डर का सक्रिय स्त्रोत है तो सत्य भी डर का उत्पादक है जो चेतन और अवचेतन मन का सत्यार्थ है. सत्य का एक पक्ष इतना प्रकाशमय है कि सत्य को कहने के बाद स्मरण नहीं रखना पड़ता. उसी प्रकार भारत के जंगलों में बाघ हमेशा याद के अवचेतन मन में उपस्थित रहता है. जंगल का अंतिम सत्य बाघ है तो समाज का अंतिम बाघ सत्य है. सत्य को कितना भी दबाया जाएगा सत्य उतना ही ऊपर स्थापित होता जाता है.
सत्य की खोज अनादि से अनंत की खोज है जो अर्वाचीन होने के साथ साथ और असोचनीय एवं अकिंचन भी है. सत्य, जंगल में बाघ की भांति अकेला है परंतु पौरुष प्रतीक है. बाघ प्रतीक हैं डर का और अंतिम सत्य का भी. सत्य प्रत्येक युग में सिंह की भांति संघर्षरत है, परंतु अंतिम विजेता भी हैं. सत्य स्वाद के धरातल पर कड़वा भले हों सदा परन्तु सिंह या बाघ की भाँति सुंदर भी हैं. सत्य की उपस्थिति, असहनीय स्वरूप को भले प्रस्तुत करती हो यदाकदा, सिंह की भाँति जंगल की प्राकृतिक व्यवस्था का सामाजिक रक्षक भी है. सत्य भी उसी प्रकार समाज की नैतिक व्यवस्था का संवाहक और रक्षक भी है.
समाज की कोई भी व्यवस्था चाहे वह कबीलाई हो, ग्रामीण परिदृश्य की हो, शहरी अथवा पूँजीवादी या साम्यवादी ही क्यों ना हो सत्य की नैसर्गिक उपस्थिति समाज की धरोहर का परिचायक है. जहाँ सत्य दफन है अराजकता प्रभावी है, फलती फूलती है और बंजर भूमि प्रस्तुत करती है. सत्य की मुक्त स्थिति और स्निग्ध प्रभाव न केवल शुद्धता और स्वच्छता की प्रतीक है बल्कि प्राकृतिक न्याय का ईश्वरीय स्वरूप है. सत्य बाघ स्वरूप है निश्चल निर्विकार निर्मल और सदैव नैतिक.

Leave a comment