जब टीवी और इंटरनेट स्मार्टफ़ोन का दौर नहीं था पुस्तकें ही एकमात्र नैतिक शिक्षा, मनोरंजन और क़िस्से- किस्सागोई का मध्यम होती थी तब की एक किताब है “एक लोटा पानी” जो गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा आज दिनांक तक लगभग 20 लाख प्रतियों में छापी जा चुकी है. समान रूप से लोकप्रिय एवं स्त्री पुरुष वृद्ध युवा सभी के लिए पसंदीदा पुस्तक हुआ करती थी. इस पुस्तक के लेखक श्री पारसनाथ सरस्वती हैं.
160 पृष्ठों की इस पुस्तक में चौबीस कहानिया है जो भारत के ऐतिहासिक प्रश्न भूमि के पाठ को कथानक के रूप में कुछ इस प्रकार प्रस्तुत करती है कि नैतिकता की शिक्षा भी स्वतः घर कर जाती है. 1977-78 में पहली बार पढ़ी यह पुस्तक आज भी जब मिल जाए तो एक दो कहानी पढ़ने से न केवल उन पुराने दिनों की बचपन की यादें ताज़ा हो जाती है बल्कि नए परिप्रेक्ष्य में उन कहानियों के नए अर्थ भी निकल आते हैं
राजा भर्तृहरि कैसे बने बाबा भर्तृहरि, एक लोटा पानी का क़र्ज़ क्या होता है, 54 मन जनेऊ, हिंदू राज्य कैसे गया, न जाने किस भेस में मिल जाए प्रभु, भक्त रविदास और कंचन काया कीर्ति के प्रति सचेत रहने के कथानक आज तक किसी भी व्यक्ति के मन न केवल उत्तेजित कर सकते हैं बल्कि बच्चों को कथा सुनने के स्रोत भी बन सकते हैं.
इन नैतिक कथाओं उद्देश्य स्थानियों में एक जान जागृति अभिजन जीवंत बनाए रखने के भले रहा वो कदाचित परंतु इतिहास से सदैव अवगत कराए रहना भी इस एक लोटा पानी की कथा संग्रह को बड़ा उद्देश्य रहा है.
इंटरनेट के इस दौर में जहाँ स्मार्टफोन की लाइट सोने के पीले बंद नहीं होती है परंतु यदि सोने के तुरंत पहला यदि इस एक लोटा पानी की एक कहानी पढ़ ली जाए या बच्चों को पढ़ा कर सुना दी जाए तो एक भिन्न समाज की वृद्धि प्रवत्ति हो सकती है.
आज भी मात्र तीस रुपए में उपलब्ध यह पुस्तक शिक्षा के वह मापदण्ड स्थापित करने में सहायक है जो हजारों रुपए में किसी भी फैंसी उपन्यास से बेहतर है जिसका इशारा आप समझ पा रहे होंगे.
यदि आपने भी बचपन में यह पुस्तक एक लोटा पानी पढ़ी है तो आपका अनुभव साझा कर सकते हैं.

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