Khivni Sanctuary

यूँ तो मध्य प्रदेश टाइगर स्टेट के नाम से लोकप्रिय हैं और पन्ना, पेंच, बांधवगढ़, कान्हा किसली और शिवपुरी जैसे नेशनल पार्क सदैव प्रकृति प्रेमियों के पसन्द और रुचि का स्थान बने रहे हैं और दुनिया भर से देसी-विदेशी नागरिक मध्य प्रदेश के बाघ के जीवंत दर्शन करने उपस्थित होते हैं. मध्य प्रदेश के दक्षिण पश्चिम क्षेत्र में खिवनी नाम का एक गाँव था जो विंध्याचल पर्वत शृंखला के बीच स्थित था. यहाँ कम संख्या में बाघ, चीता, भालू, हिरण और बहुतेरे पक्षी अपनी उपस्थिति से इस क्षेत्र को एक पूर्ण इकोसिस्टम बनाते हैं.

1954 में इस गाँव को विस्थापित किया गया ताकि जानवरों के हमले से गाँव के नागरिकों और उनके पशु की रक्षा सुरक्षा हो सके और इस क्षेत्र को जीव अभयारण्य का दर्जा दिया गया.

आश्चर्य तो तब हुआ जब पता पड़ा की यह खिवनी अभयारण्य इंदौर से मात्र 130 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जहाँ रुकने की भी समुचित व्यवस्था है और घना जंगल होने के कारण पारिस्थिकी पिरामिड के हर स्तर पर स्थापित जीवों के दर्शन भी लगभग हर बार हो ही जाते हैं.

कुछ मित्रों के साथ एक दिन कार्यक्रम बनाकर ट्री पाई रिसोर्ट में डेरा किया. साढ़े 4 गोधूली बेला की सफारी ली और एक नियत स्थान पर हरे-भरे खुले मैदान (ग्रासलैंड) में रुक गए. गाइड के द्वारा कहा गया कि यहाँ टाइगर के होने की खबर है. सूचना मिलती गई कि यहाँ पर एक मादा बाघ जिसे मीरा नाम दिया गया है अपने वयस्क होते बच्चों के साथ नाले के समीप पेड़ों के मध्य विश्रामरत है. परंतु इस मैदान में हिरणों और मोर मोरनी के अतिरिक्त कुछ नहीं दिख रहा था.

क्या हो जब मई की शाम भी ऊपर से तेज सूर्य के तपन, लगभग लू जैसी हवा आपके तन को टेन कर रही हो और मन को बेचैन. यूँ तो आग बरस रही थी परंतु घास के मैदान में उपस्थित विभिन्न प्रकार के पक्षियों तथा चीतल की बड़ी संख्या को देखकर मंत्रमुग्ध होते रहे और आँखें एक स्थान पर तकती रही कि जंगल के राजा या यूँ कहें कि रानी अपने बच्चों के साथ दिख जाये.

काली-पीली पट्टियों से अलंकृत त्वचा लिए ये जादूगर जीव शायद यही कहीं उपस्थित होगा और डेढ़ घंटे की तपस्या के बाद बाघ का एक बच्चा दिखाई हुआ फिर दूसरा फिर तीसरा और जब वे तीनों एक दिशा में चले गए तब यह रानी बाघ मीरा अपनी झुरमुट से निकल कर खुले मैदान में आ गई. हम स्तब्ध !
हमारी आँखें आश्चर्यचकित !
दिल की धड़कने सुनाई देने लगीं!

उसी समय बंदर हिरण के खतरे की सूचक कॉल भी सुनाई देने लगे. चिड़ियों की चहचहाहट बढ़ गई और बाघ की चाल के समक्ष हम मंत्रमुग्ध हो विस्तारित नैनों से निहारते रहे.

मीरा ने पहाड़ी पर चढ़ने का रास्ता पकड़ा था. हमारे मोबाइल कैमरे, डिजिटल कैमरे खटकने लगे. वीडियो बनने लगे, फोटो उतरने लगे परंतु वह बिंदास अकिंचन बाघिन धीरे धीरे अपना रास्ता तय करते हुए गाड़ियों के सामने से हुई पहाड़ी चढ़ गई.

और लुप्त हो गई. 10 मिनट इंतज़ार किया

बाघ के पीछे जाने के लिए आकांक्षा हुई तो कहा गया कि अपन नदी की तरफ़ चलते है. नदी सूखे थी, वाहन जा रहे थे तभी वही बाघ आँखों के सामने 100 मीटर की दूरी पर पुनः प्रदर्शित हुई और धीरे धीरे दर्शन देते हुए अपनी अद्भुत प्रदर्शनी का अवलोकन कराते हुए घने जंगल में गुल हो गई.

हालांकि जंगल यात्रा सब को पसंद आए यह आवश्यक नहीं परंतु इन प्रेमियों को भी प्रत्येक जंगल यात्रा में बाघ जैसे जीव के दर्शन हो यह भी संभव नहीं है. अगले दिन सुबह की सफारी में हमें कोई बाघ देखने को नहीं मिला जब की उस क्षेत्र में एक क़द्दावर जवान नर बाघ जिसका नाम युवराज है का भी मूवमेंट है.

जंगल के इकोसिस्टम में बाघ सब से उच्च स्तर पर स्थित स्थापित है और जिसके प्रति रुचि उच्चतम शिखर पर है जिसे बच्चे बड़े बुड्ढे स्त्री पुरुष गाइड सब देखने के लिए सदैव लालायित रहते हैं. इसके अतिरिक्त भी जंगल बहुत कुछ दिखा ने को प्रस्तुत करता है बस आपकी निगाह होनी चाहिये.

यहाँ ग्रीन- लैंड में पक्षियों की प्रचुर संख्या उपस्थित थी. मोर मोरनी अपनी बच्चों के साथ बड़ी संख्या में विचरण करता दिखाई पड़े. इसके अतिरिक्त पक्षियों में नाईट जार, ट्री-पाए, नीलकंठ, तीतर, बटेर , किंगफिशर, बाज, मैना, बीईटर जैसे पक्षियों की दर्शन के साथ साथ उनके कंठ ध्वनि से भी निरंतर प्राप्त होती रही. यहाँ तक की खरगोश भी देखने को मिले परंतु गर्मियों के मौसम होने से सागौन के वृक्ष लगभग सूखे की स्थिति में थे और हम यह परिकल्पना करते रहे कि बारिश के बाद यह अभयारण्य और शानदार होगा

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