आओ बेटा चलें, निगम पार्षद ने बुलाया है देख लें क्या समस्या है ? पिता ने बेटे को अपने साथ चलते हुए कहा. वहाँ पहुँचने पर दृश्य कुछ तनावग्रस्त था जहाँ इस किराना दुकान व्यापारी के संदर्भ में कही गई बातों से पार्षद महोदय न केवल उत्तेजित थे बल्कि सबक़ सिखाने को भी तैयार थे.
व्यावसायिक मानसिकता के चलते अपनी गलती न होने के बाद भी उन्होंने क्षमा प्रार्थना करते हुए कहा कि मैं क्षमा माँगता हूँ पर पार्षद महोदय सुनने को तैयार नहीं बोले एक शर्त पर क्षमा कर सकता हूँ मेरे जूते उठाकर जूते की रैक में रख दो.
इस पर किराना व्यापारी के आत्मसम्मान का स्वतंत्र आसमान में बाज़ की तरह उठ खड़ा हुआ और आसन्न अपमान को देखकर वह हाथ जोड़कर बेटे को साथ ले बिना बोले उस बैठक से बाहर निकल गये और घर लौट आए. माहौल घर में भी बढ़ा तनाव ग्रस्त हो गया परंतु शाम को उस किराना व्यापारी के बेटे ने देखा कि उसके किराना व्यापारी पिताजी अपने चार वर्षीय पोते के जूते उठाकर सही जगह पर रख रहे थे.
जवान बेटे की आँखों के सामने सुबह का दृश्य लहरा गया और उसने पूछ लिया, पिताजी सुबह किया वह सही किया और अभी आप जो कर रहे हैं वह ग़लत है!
इस पर किराना व्यवसायी ने मुस्कुराते हुए कहा,
सुबह को मेरा आत्मसम्मान धागे की डोर पर टूटने को आ गया था जब एक छोटे से विवाद की राजनीतिक व्यक्तित्वों ने अपने अहंकार की तुष्टि-पुष्टि – संतुष्टि के लिए घमण्ड, दंभ, गुरूर और अकड़ से मुझे चुनौतीपूर्ण स्थिति में ला दिया था. इसलिए मैं अपने आत्म सम्मान की रक्षा हेतु वहाँ से बिना कुछ कहे लौट आया. इसका नुक़सान मुझे अवश्य होगा परंतु अपने पोते के जूते उठाने में मेरा आत्मसम्मान कहीं रोड़े नहीं अटकाएगा यह मेरे लिए कमोबेश गर्व का विषय भी होगा.
अब पुत्र के मन में अहंकार और आत्मसम्मान की अव्यवस्थाओं का संशय उत्पादन हुआ तो यह प्रतीत हुआ कि अहंकार जहाँ स्वयं और दूसरे के बीच एक नकारात्मक भावना का प्रतीक है वहीं आत्म-सम्मान व्यक्ति की स्वयं और दूसरे के प्रति सकारात्मक ऊर्जा एवं भावना का द्योतक है.
अहंकार जहाँ विभिन्न शब्दावलियों जैसे दंभ, गरूर, घमंड, दर्प, अकड़ और गुमान से आलोकित है जो रावण के 10 सिरों की भाँति प्रतीत होता है. आत्म-सम्मान मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम की भाँति एकला चलो रे के भाव से प्रचलित होता है.
मैं ही श्रेष्ठ होने का सुप्रीम दंभ “मैं – मेरा – मुझे” के त्रिकोणीय दर्प और अभिमान अंकित कराता है कि जैसे ऊपर कोई नहीं और यह दंभ, अहंकार नामक भावना व्यक्ति का भोजन है.
मैं भी श्रेष्ठ होने का न्यूनतम सम भाव “मैं – आप – हम” के त्रिकोणीय दर्शन से परिचय कराता है जो आत्म सम्मान के हम आप और मैं के एक समभाव से एक दूसरे के समुचित सम्मान को प्रस्तुत होता है.

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