थमो कभी किसी पेड़ के नीचे
सुनो पत्तियों की सरसराहट
बहती हवा हौले से कहती कुछ
सुनो हृदय से सन्नाटे में हर आहट
थमो कभी किसी बहती नदी किनारे
तको नदी को जैसे बहता समय हौले हौले
लहरें उठती गिरती नाचती नृत्य करती
सुन सको तो सुनो क्या कहती हौले हौले
थमो कभी यूँ ही किसी पहाड़ के नीचे
करो वार्ता कि प्रभु बैठे तुम यहाँ कब से
पूछो क्या तुम में है कोई जीवन या स्थिर
दिखते सदा जवान जैसे स्थापित कल से
थमो कभी ऐसे ही कहीं शांत बग़ीचे में
देखो कैसे बहती हवा क्या कहती है
जब वह हौले से सहलाती दुलारती
बिना दिखे भी सदा प्राणदान करती है
थमो कभी इस माया की इस दौड़ से
तजो लोभ और रखो मोक्ष से वास्ता
करो कुछ ऐसा कि हो भीतर की यात्रा
खोजो सत्य को जिसका नहीं कोई रास्ता
थमो कभी बैठो अपने संग ही बतियाते
देखो कितना भीतर भरा है विष वो
थामो अपना ही हाथ कि मित्र हमारे
अकेले से अकेले होने की यात्रा हो

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