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रुक जाना नहीं तू कहीं हार के……के प्रेरक गीत का धनात्मक संज्ञान भारतीय मानस में इस गीत के सृजन वर्ष 1974 ( इम्तिहान फ़िल्म) से अपेक्षित था परंतु इस एक प्रेरक गीत का सकारात्मक प्रभाव कमोबेश भले हुआ हो देश की प्रगति में, नकारात्मक रूप से इस गीत का प्रयोग यदा कदा, यत्र तत्र सड़क पर दिखाई पड़ता है. कैसे?
जैसे ही चौराहे पर ट्रैफिक रोकने का संकेत हो जाए तो वाहन चालक की अवचेतन मन में सुप्तावस्था में पड़ा हुआ यह गीत, “रुक जाना नहीं तू कहीं हार के” सक्रिय हो उठता है और प्ले हो जाता है. वाहन चालकों की दुविधा की मानसिकता से ज़ेब्रा क्रासिंग या रोकने के संकेत की लाल बत्ती का संदेश भी “रुक जाना नहीं” के उद्घोष के साथ नियमों का उल्लंघन कर आगे बढ़ जाती है. गुनगुनाते हुए, “रुक जाना नहीं” !
यह गीत न केवल प्रेरणा का स्त्रोत है बल्कि विश्वास करें या न करें दुर्घटना का भी स्रोत है. जब दो बड़े वाहनों जो ट्रैफिक सिग्नल पर रुके हुए हों, के बीच के रिक्त स्थान पर दबंग और ताक़तवर दोपहिया वाहन या कमज़ोर और दया के पात्र स्कूटी जैसे छोटे वाहन भी अपने अगले पहिए की थूथनी इन दो बड़े वाहनों के बीच फँसा देते हैं गुनगुनाते हुए कि “रुक जाना नहीं” और भूल जाते हैं कि सामने वाला बड़ा वाहन यदि पीछे एक बार आये या पीछे वाला वाहन आगे बढ़े तो वाहन की लौह मिश्रित प्लास्टिक काया और मानव की मरियल काया का नाश होना तय ही है.
रुक जाना नहीं तू कहीं हार के, कांटों पे चल के मिलेंगे साये बहार के…. इस सुंदर गीत की रचना के माध्यम से नैतिक और निष्ठावान उपायों के माध्यम से व्यक्तिगत सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर की उन्नति और विकास के संदर्भ में एकजुट हो प्रयास करने के संदेश सारगर्भित हैं और आसानी से समझें जाने योग्य हैं.
परंतु पिछले 78 साल के स्वतंत्रता काल मैं व्यक्तिगत लाभों के लिए अनैतिक और भ्रष्ट उपायों के माध्यम से जो धनोपार्जन के प्रयास किए गए हैं वे इस सिद्धांत को सिद्ध करते हैं कि जब भी कोई अनैतिक वासना या लोभ का ललचाता हुआ प्रस्ताव आए तो मस्तिष्क के नेपथ्य में रुका हुआ यह गीत चलने लगता है और उन तो मस्तिष्क की कमज़ोर भावनाओं वशीभूत हो अनैतिक कार्य को कर बैठता है, पृष्ठ भूमि में कहीं यही गीत बज रहा होता है, रुक जाना नहीं तू कहीं हार के!
विचार कीजिएगा!
“Ruk Jaana Nahin Tu Kahin Haar Ke” is a classic Hindi motivational song from the 1974 Bollywood film Imtihan. It was sung by Kishore Kumar, with lyrics penned by Majrooh Sultanpuri and music composed by Laxmikant-Pyarelal
मुहिम- चुटकी भर अनुशासन के अंतर्गत जान जाग्रति हेतु प्रसारित.
हम थोड़ा सा बदलेंगे तो देश भी अनुशासित होगा . बाक़ी सड़क पर वाहन चलाते हमारा मानस भंगार हो रक्खा है.


आप के लेख पहले भी पढ़ रखें है, बिलकुल सटीक और वास्तविक होते हैं। आधुनिकता से हट कर, वास्तविकता के पास। समाज की सत्यता और खूबसूरत कटाक्ष के साथ।
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आपका कथन मेरा संबल है
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लेख अच्छा है . खूबसूरत कटाक्ष ।
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आभार आदरणीय
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हाँ इस गाने के बारे में positive…और सिर्फ़ positive ही अब तक दिमाग़ में आता था रुक जाएंगे तो stagnant हो जाएंगे बहते रहेंगे तो एक्सपोजर भी होगा सीखेंगे भी नये नये लोगों से मुलाक़ात स्वयं की प्रगति सभी कुछ तो चलते रहने में आता है चलते रहना ही एक इंसान की पहचान है यही तो बचपन से हम सीखते आए हैं इस song का निगेटिव Impact इस तरह हो सकता है सोचा नहीं था हाँ कोई भी व्यक्ति जब गति में आता है चाहे वह ग़लत डायरेक्शन में ही जा रहा हो तो दिमाग़ ,शरीर ,मन सब उसी गतिमान अवस्था में रहते हैं और उस mode को change करना ट्रैफ़िक नियमों से संबंधित ….👇🏻 दूर है और green light है तो vehicle की स्पीड भी तेज हो जाती है लेकिन signal तक पहुँचते ही red light हो जाए तो सबसे पहले दिमाग़ में आता है … अरे yaaaaaar ज़्यादातर लोग रुक जाते हैं पर कुछ एक ऐसे होते हैं क्या होगा कुछ नहीं होगा निकल चलते हैं इन लोगों के पास समय की हमेशा कमी रहती है हर काम हड़बड़ी में करना यह भी मानव प्रकृति दर्शाता है एक मानसिक बीमारी मानव हित के लिए ही नियम बनाए गए हैं *चलते रहना ही ज़िंदगी नहीं …थोड़ा सा रुकिए ,देखिए और फिर सोच समझकर* *आगे बढ़िए*
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Adbhut. Aabhar
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Indians don’t realise that they don’t always need to carry a gun to kill someone. A high speeding car is also a weapon in your hands.
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