Little Vendor

……दरी…..

दरी ले लो दरी …
माताजी दरी ले लीजिए…
नहीं भैया, जरूरत नहीं है है हमारे पास.
माताजी गलीचा ले लो बेडशीट ले लो तकिए के कवर ले लो …
नहीं भैया नहीं चाहिए परेशान मत करो.
माता जी थोड़ी सी दया हो जाए…

दरवाजे पर खड़ा एक बुजुर्ग जिनकी दाढ़ी भी सफेद हो चुकी थी, घर की मालकिन से कुछ खरीद लेने की दया चाह रहा था …घर के मालिक ने पीछे से देखा उसे लगा की इस रेहड़ी वाले की मदद की जाना चाहिए उन्होंने अपनी पत्नी को इशारा किया उन्होंने 350 की एक दरी बिना मोल भाव किए खरीद ली.

विचार के घोड़े भी कई प्रकार के होते हैं… चाबुक मारे या चाबुक दिखाएं या घोड़े को प्यार से सहलाएं, विचार के घोड़े दौड़ पड़ते हैं …मेरे भी मन में विचारों का घोड़ा कुछ इस प्रकार दौड़ पड़ा कि आखिर यह भाव क्यों उत्पन्न हुआ कि जब हम समाज के धनी एवं संभ्रांत व्यापारी वर्ग को व्यवसायिक समर्थन देकर शॉपिंग मॉल या बड़ी दुकानों से महंगा सामान खरीद लेते हैं बिना मोलभाव के … तो एक भाव सहायता का, सहयोग का , अनुग्रह का, दया का… छोटे व्यापारियों के प्रति भी कुछ इस प्रकार विकसित हो जाए कि वह भी जीवित रहने के लिए अपनी दैनिक रोजी रोटी के लिए मेहनत से कमाई कर सकें

यह हमारी भी विचारधारा होनी चाहिए कि ब्रांडेड और उच्च मूल्य का दैनिक उपयोग में आने वाला सामान विक्रेता जो मल्टीनेशनल कंपनी से लेकर इंडियन मेजर्स हैं उन्हें आप का दिया हुआ पैसा उनके चांदी के बर्तनों को खरीदने में काम आएगा जबकि आपकी छोटी सी सहयोग राशि इन देहरी वाले, सब्जी वाले, साइकिल पर घूम घूम कर सामान बेचने वाले, हाथ ठेला चलाने वाले छोटे व्यापारी की उस दिन की रोटी या बहुत हुआ तो बच्चे की पढ़ाई में काम आने को प्रस्तुत होगा …

कहीं हम चूक तो नहीं रहे, आगे बढ़ने की दौड़ में …कोई पीछे न छूट जाए …यह ध्यान रहे

One thought on “Little Vendor

Add yours

Leave a reply to rachgupt2371 Cancel reply

Blog at WordPress.com.

Up ↑