चाय के कप में ज़िन्दगी…
चाय की ज़िन्दगी या ज़िन्दगी की चाय,
रंग रस रास राग से दोनों पहचाने जाय.
सुबह से ही नयी तलब जगाती है ज़िन्दगी,
अपने होने के अहसास से जगाती है ज़िन्दगी.
सुबह से ही चाय की गरमा प्याली जगाती है,
नैनो से निहार कर भीतर तक उतर जाती है.
पहले घूंट से जीभ में तरंग उपजाती,
तो मन के तार तक मस्ती पहुंचाती.
सुबह की चाय की चाह है बड़ी अनमोल,
मिल जाये तो वो स्वाद, न मिले कहीं ओर.
पत्ती,अदरक पुदीना काली मिर्च और तुलसी,
दूध, शक्कर और गुड़ से ये परम रसभरी चुसकी.
आधे कप तक पहुँचते की चाय से मन प्रसन्न,
और अंत आते आते मन सब उर्जा से संपन्न.
आखिरी घूंट को मैं मन भर यूं देखता,
जैसे शरीर छोड़ आत्मा, नभ में समा जाती.
ज़िन्दगी भी चाय जैसे परोसी जाती है,
हरेक के हिस्से भिन्न-भिन्न स्वाद लाती है.
ज़िन्दगी उजली तो कोई काली है,
कोई सरल तो कोई नखराली है.
चाय की अनुभूति जैसी गाढ़ी पतली,
कोई बेस्वाद तो कोई मीठी ज़िन्दगी.
ताप पर खूब खौलती चाय तो अच्छी बनती,
खूब तपाती तभी ज़िन्दगी भी नरम बनती.
ये चाय की चाहत, घूंट घूंट में रस भरती
कल्प दर कल्प जिन्दगी भी रंग भरती
आखिरी घूंट के साथ चाय भी थम जाती,
तो अंतिम सांस के साथ ये भी थम जाती.

Greed Unlimited
Moment Minima
Be, in Nothing
शून्यता भली, गिनती से
मानव मन मलिन….!?
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