Poem: MeghMalhar

मेघ मल्हारआज रात कितनाजल तुम घर लाएऔर तर करनेतुम सारा जग आयेधीर गंभीर तुमधीरे से आ मुस्काएपौध पेड़ सींचसबको तुम हरसायमेघ तुम देवप्रकृति के पोषक सदासावन भादों भरेकृतज्ञ मुझे होना सदाटप टप बूंदेंगहरे जाती पैठबरस भर काबैकुंठ यही जाता बैठधन्य प्रभु तुमगान मल्हार सदा यूं करतेकोई माने या ना मानेमेघ सदा अपना कर्म करते

Jhukna Padta hai

राखी पर भाई का फोन न आयेतो बहन को झुकना पड़ता है. जब भाई के काम भाई न आयेतो सबके सामने झुकना पड़ता है. मुसीबत में दोस्त मदद को न आएतो समझौते को झुकना पड़ता है. जिद्दी अपना बेटा ही जब न मानेतो क्षमा कर खुद झुकना पड़ता है. खराब रिश्ते, पानी पीने को मांगेकायम... Continue Reading →

शून्यता भली, गिनती से

शून्यता भली, गिनती से…. बारिश में रहोभिगो नहींतपन में रहोजलों नहींतनहा भले रहोलड़ो नहींमस्ती में रहोसहो नहींदौड़ते रहोथको नहींयात्रा में रहोपहुंचो नहींआकाश रहोउड़ो नहींजमीन रहोजुड़ो नहींभक्त रहोचाहो नहींउम्मीद रखोटूटो नहींपढ़ो और बढ़ोरुको नहींप्रयास में रहोसमेटो नहींप्यार में रहोडूबो नहींप्यासे रहोतड़पो नहीडूबो भलेउलझो नहींतैरते रहोललचाओ नहींचैतन्य रहोमगन नहींलीन रहोनशेंमन नहींयात्री रहो,ठहरो नहीं।शून्यता में रहोगिनती में नहीं।

Blog at WordPress.com.

Up ↑