राम राम सा…

जय श्रीराम या राम – राम का अभिवादन प्रतीकात्मक नहीं है धार्मिक या आध्यात्मिक रुचि का बल्कि विभिन्न परिस्थितियों में जय श्रीराम के निहितार्थ भी भिन्न हैं.

जय – श्रीराम एक उद्बोधन मात्र नहीं है जो सामने सामने हुए व्यक्तियों के मिलने पर अभिवादन का प्रतीक है बल्कि जीवन के विभिन्न सुख एवं दुख के आयामों के प्रकटीकरण का प्रतीक है जैसे कि-

कल रात को प्लॉट के सौदे की बैठक थी और सौदा जय श्रीराम हो गया है अर्थात सौदा बन गया है या जैसे का दादा जी अस्पताल में भर्ती थे और कल रात की जय श्रीराम हो गए याने परलोक सिधार गए.

या जैसे की बोलचाल में कहा जाए मेरे से तेज़ नहीं चलना तुम्हारा जय- श्रीराम कर दूँगा से तात्पर्य है कि संबंधों को भी तिलांजलि दे दी जायेगी.

शब्द-गणित से राम के शब्द उच्चारण करने से 108 के अंक की प्राप्ति होती है जो आश्चर्यजनक रूप से पृथ्वी के व्यास की सूर्य की दूरी के बराबर है और चंद्रमा के व्यास की पृथ्वी से दूरी के बराबर है. राम राम का उद्बोधन किसी व्यक्ति को प्रणाम से अधिक ऊर्जा को प्रणाम का प्रतीक माना जाता है.

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