
पिता स्थूल जीव मात्र नहीं
पिता ऐसे प्राणप्राण होते
घर की धुरी में अनमोल
धन-मशीन मात्र नहीं होते
पिता उस जीव के वाहक
संतान के जनक मात्र नहीं
नौ माह के गर्भ से आगे हो
जीवन सुरक्षा के हामी होते
पिता एक नाम मात्र नहीं
एक अलौकिक दायित्व है
संतान के फलने फूलने का
एक अलिखित साहित्य है
पिता की निगाह सदा गोचर
पलते बढ़ते यूँही नहीं देखती
समाज के सरोकारों से लदी
संतान की हर इच्छा पूरी करती
पिता वह दृश्य उसे दिखाता है
जो संतान सोच नहीं पाता है
सफल उसका जीवन बनाने को
सेहत अपनी भी दांव पर लगाता है
पिता कहीं पहाड़ों पर रक्षा में
तो कहीं समंदर में सेवा करे
परिवार की उन्नति हो ऐसी
जीवन अपना ऐसे होम करे
कहीं व्यापार में ऐसे पसीना
तो कहीं मजूरी में कलकल बहे
पिता कभी किसी से कहे नहीं
भले तिल तिल रोज घटता चले
पिता बनना आसान नहीं
घर द्वारे परदेश की उड़ान दे
जो संतान सफल तो श्रेय पूरा
माँ और बच्चे की मेहनत को दे
पिता धीरे धीरे किनारे होते
शिकायत किसी से न करते
भले हो रुष्ट किसी से कितना
ज़ुबाँ से ज़िक्र कभी न करते
आँखों के समक्ष ये पिता ऐसे
जवान कर्मठ से बूढ़े होते जाते
मुनाफ़े से घाटे के प्रतीत होते
सिरे से हौले हौले ख़ारिज होते जाते

श्रद्धा की भाषा, पिता की परिभाषा l आपको साधुवाद l
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