मज़ा ते सजा:पूरक तत्व

मज़ा और सजा लगभग एक ही शब्द अभिज्ञापक हैं और तुकांत भी प्रस्तुत करते हैं परंतु अर्थ में दोनों विपरीत अर्थी है

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि मज़ा और सज़ा दोनो एक दूसरे के पूरक प्रतीत होते हैं. प्रश्न उठ सकता है कि ऐसा कैसे है तो कहा जाता है जहाँ मज़ा है वहाँ सजा है और जहाँ सज़ा है वहाँ भी मज़ा है

ख़ुलासा किए जाने पर ये ता सिद्ध होता है कि मज़ा दो परिस्थितियों का वाहक है जिनमें नैतिक और अनैतिक के तराजू के पलड़े में मज़ा और सज़ा होती है. यदि कृत्य नैतिक है तो मज़ा है जिसमें कम सज़ा है

यदि कृत्य अनैतिक है तो मज़ा में अधिक सजा है ! उसी प्रकार नैतिक के समझ आने तक अपने कर्मों से मिली सजा भी एक अवसर उत्पन्न करती है, जहाँ सजा से मज़ा प्राप्त किया जा सकता है.

ध्यान और भक्ति के मार्ग पर चलकर यों ही मज़ा में सजा नहीं कहा गया है और युही सजा में मज़ा नहीं कहा गया है. स्वाभाविक रूप से ये ज्ञानेंद्रिय के माध्यम से अंगीकृत मज़ा कम से कम सजा का द्योतक है परंतु अवैधानिक कर्मेन्द्रिय और ग्यान इंद्रीय के प्रयोग से मज़े की प्राप्ति में किया गया दुष्कर्म सजा की परिभाषा स्थापित करता है

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