अन्तरात्मा

बचपन से ही एक कथा सुनते आते हैं कि हर मानव के अंतर्मन में दो भेड़िये रहते हैं.
एक अच्छा और एक बुरा.
और दोनों आपस में लड़ते रहते हैं!
यह पूछे जाने पर कि आख़िर इन भेड़ियों की लड़ाई में जीतता क़ौन है ?

तो उत्तर मिलता था जिस भेड़िए को तुम भोजन कराते हैं वह भेड़िया जीत जाता है. अच्छे को भोजन कराएं तो अच्छा भेड़िया जीत जाएगा. बुरे को भोजन कराया तो बुरा भेड़िया जीत जाता है.

वस्तुतः तो भेड़िए की यह कहानी परिकल्पना है और मानस में क्या पल रहा है…क्या चल रहा है यह प्रत्येक व्यक्ति के मन में भिन्न है.

अंतरात्मा याने आंतरिक चेतना जो नैतिकता की कसौटी पर हर निर्णय को कसती है कि यह निर्णय सोने की शुद्ध धातु की तरह खरा है या रांगे की मलिन धातु की तरह खोटा है.

क्रिकेट के एक मैच में, चयनित दो खिलाड़ियों में से एक का ही खिलाड़ी का चयन ओपनिंग बल्लेबाज़ के रूप में किया जाना था. कप्तान और कोच दुविधा में थे. कप्तान के पूछने कह कोच ने कह दिया कि कप्तानी है तुम्हारी. अब तुम्हारा निर्णय है, किसे खिलाना है. कप्तान ने अपने आपको एक कमरे में बंद किया और निर्णय किया कि एक खिलाड़ी के लिए एक सिक्के को हेड्स और टेल्स के लिए उछालकर बेस्ट ऑफ़ थ्री अर्थात तीन बार सिक्का उछालकर जिसके नाम पर दो बार हेड्स आ जाएगा उसे खिला लेंगे. प्रथम दो बार में दोनों खिलाड़ियों के पक्ष में आ जाने पर दुविधा दोगुना हो गई. उसी समय पर कैप्टेन ने अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनने का निर्णय किया तीसरी बार सिक्का उछालने पर सिक्का के ज़मीन पर गिरने के पहले ही अंतरात्मा ने जिस खिलाड़ी की कामना की कि इस खिलाड़ी को मैं देखना चाहता हूँ उसी समय उन्होंने निर्णय कर लिया और सिक्के की ओर नहीं देखा ही नहीं.

इस प्रकार के निर्णयों में विवेक, प्राकृतिक न्याय, नैतिकता, पारिवारिक संस्कार और ग्रहण की गई शिक्षा के पाँच मूल तत्वों का समावेश होता है.

जहाँ शिक्षा और पारिवारिक संस्कार लंबे समय तक प्रशिक्षित होने का पराक्रम है जबकि विवेक , प्राकृतिक न्याय और नैतिकता हमारे आस पास के सामाजिक माहौल, उत्तम सोशल मीडिया, धार्मिक शिक्षा और शौकिया पढ़ी गई पुस्तकों हुई और देखी सुनी पढ़ी कथाओं के अवचेतन मन में अंकित होने की प्रक्रिया से पोषित होता है.

विवेक प्राकृतिक न्याय की अभिव्यक्ति है जो अन्यायपूर्ण कानूनों के विरुद्ध खड़ा होता है।
नैतिकता वे मूल्य और सिद्धांत हैं जो व्यक्ति को ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और न्यायपूर्ण आचरण अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं.

विवेक अंतरात्मा की धुरी है केंद्र बिन्दु है जो किसी भी निर्णय को लेने के समय में नैतिक रूप से सही या ग़लत कार्य की तुला पर समुचित आंकलन के लिए हर व्यक्ति परखने का मौक़ा अवश्य देती है. आमतौर पर किसी भी क्षेत्र में निर्णय लेने में दुविधा यह अनिवार्य रूप से कहा जाता है कि अंतरात्मा की आवाज़ पर कार्य कीजिए.

अंतरात्मा कोई अंग नहीं है, ये सब मस्तिष्क की भावनात्मक सोच विचार की क्षमता क़ा पी प्रतीक है. मन की ग्रहण की गई शिक्षाओं के परिणाम स्वरूप प्रशिक्षित मानस का निर्णयात्मक निचोड़ है. निर्णय लेने की क्षमता सब में होती है परंतु सही निर्णय लेने की शक्ति विभिन्न आयामों में प्राकृतिक न्याय, ग्रहण की गई शिक्षा, पारिवारिक संस्कार और विवेक के साथ नैतिकता पर निर्भर है.

anta

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