मेरा पुनर्जन्म कैसा हो?

अगले जनम में क्या बनना चाहोगे??

इस अजूबे प्रश्न को सुनकर मुझ पर तो जैसे वज्रपात हुआ और एक क्षण को मेरे प्रिय मित्र के प्रश्न का उत्तर आने से पहले यह भाव जनित हुआ कि बेटा अनिल यह प्रश्न अब किसी भी दिन सर्वशक्तिमान परम पिता के द्वारा भी पूछा जा सकता है जिसके बारे में तुमने आज तक नहीं सोचा.

स्तब्ध रह गया मैं.

यह तो तय है कि दुनिया के परिचालन में पृथ्वी पर रहवास की अवधि समाप्त हो जाने पर निश्चित रूप से चोला बदलकर नई काया धारण कर पृथ्वी पर पुनः आगमन की स्थिति बनती है. सनातन धर्म में जहाँ पुनर्जन्म की अवधारणा सिद्धांततः और वस्तुतः स्थापित है जिसके कारण और प्रमाण भी यदा कदा उपस्थित होते रहते हैं.

कल्पना की मैंने कि यह स्थिति तो उत्पन्न ही होगी और उस समय जब आत्मा के शरीर-अंतरण की अवस्था में एक व्यक्ति भौतिक काया को छोड़ता है तभी अगले चोले में जाने का अवसर उत्पन्न होता है! जब आत्मा रूपी ऊर्जा के समक्ष शरीर चुनने का अवसर प्राप्त होता होगा. इसके साथ माता – पिता चुनने का अवसर, स्वस्थ शरीर चयन का अवसर,
लिंग चयन के साथ देश घर द्वार-चार चुनने का,
व्यवसाय चुनने का
शैक्षणिक स्तर चुनने का प्रश्न है.

भगवद गीता अनुसार कर्मफल सुनिश्चित है. यदि कर्मों के अनुसार तो आत्मा का शरीर निर्धारण न हो तो क्या परम पिता परमेश्वर के अभिकर्ताओं के समक्ष अपनी आकांक्षा अनुसार माँग रखी जाने का विधान हो तो क्या होगा ? यह एक जटिल प्रश्न हो सकता है!

प्रश्न के उत्तर में मेरे मन मस्तिष्क मानुस में जैसे मेरे जीवनकाल का दृश्य रूप में एक द्रुत चलचित्र एक क्षण में घूम गया ….

मेरा बचपन,
बौद्धिक विकास के शैक्षणिक सत्र,
शारीरिक कौशल विकास के पल-प्रतिपल,
व्यवसाय धनोपार्जन,
मोह, प्रेम, वासना के दौर,
नैतिक अनैतिक कर्म के निर्णय,
लोभ से रुपयों का अंबार की दौड़,
श्रेष्ठता का घमंड,
कौशल का दंभ,
मैं ही सही का गर्व,
पारिवारिक विस्तार और न जाने क्या क्या!

सोचते सोचते, पुनर्जन्म के लिए मेरे विकल्प हेतु यह मन आया और कह दिया मित्र से

मोक्षमार्गी साधु होना चाहता हूं. हम सामाजिक जीव, सांसारिक बुराइयों की चाशनी में जीभ लपलपाते हुए और जी ललचाते हुए अधोगामी हुए चले जाते हैं. जन्म की राह का उद्देश्य मात्र, भोग नहीं हो सकता है बल्कि मुक्ति भाव की ओर एक सीढ़ी ऊपर चढ़ने का योग बने और मोक्ष मार्ग की आकांक्षा के भाव की उत्पत्ति अनुभूति के अतिरिक्त कुछ शेष न रहे. अगले जन्म में इस जन्म के आध्यात्मिक स्तर से उच्च स्तर की आध्यात्मिक साधुमन के साथ जीवन यात्रा हो जहां नियंत्रणकारी अलौकिक ईश्वर के निराकार सर्वशक्तिमान अथवा साकार रूप से साक्षात्कार का अवसर उत्पन्न हो…भले हॉर्मोन मुक्त होना पड़े!

दूरभाष पर संवाद करते इन मित्र के मेरे यह कथन करते ही जैसे उन्हें अचंभा हुआ बोले कि ऐसा कैसे सोच सकते हो ? और क्या इस दुनिया से तुम इतना परेशान हो? मोक्षमार्गी तो अभी भी हो तुम अपने विचार, सेवाभाव और सत्कर्मों से.

मैंने भी अपना वक्तव्य जारी रखा.

दुनिया से परेशान नहीं हूँ परंतु इस सामाजिक व्यवस्था का अनुभव कर चुका हूँ और अब 1 सीढ़ी ऊपर चढ़कर 1 नया अनुभव करना चाहता हूँ जहाँ शरीर के पार शरीर की अलौकिक शक्तियों से साक्षात्कार करने का मन होता है. इस पूर्ण सामाजिक जीवनकाल में
हमें स्वस्थ रहने
धन कमाने
सफल होने
यश कमाने की चाहत रखती है और इस बाहरी संसार को प्राप्त करने की लालसा में हम भीतर की यात्रा भूल जाते हैं जो अनिवार्य है उसकी अनन्य लालसा है इसलिए जाग्रत होना चाहता हूँ. सामाजिक भोग विलास का, भोग विलास की माया का परित्याग कर जीवन के अगले पड़ाव पर प्रस्तुत होना चाहता हूँ जो
जाग्रत और आत्म केंद्रित साधुत्व का जीवन हो सकता है
एक वृक्ष का जीवन हो सकता है
पहाड़ का जीवन हो सकता है
एक नदी का जीवन हो सकता है
एक पृथ्वी का जीवन हो सकता है
एक सूर्य का जीवन हो सकता है
एक ब्लैक होल का जीवन हो सकता है
एक तारे का जीवन हो सकता है
एक ब्रह्मांड का जीवन हो सकता है और
एक आकाशगंगा का भी जीवन हो सकता है. और हाँ आपका कथन आंशिक रूप से सत्य है कि मैं मोक्षमार्गी हूँ परंतु सामाजिक व्यवस्था में भोगमार्गी भी हूँ. आंशिक मोक्ष हामी और मुख्यतः भोगहामी. ये सामाजिक व्यवस्था, ये शरीर में उपस्थित नाना प्रकार के हॉर्मोन चैन से बैठने नहीं देते हैं.

जीवन की परिभाषा मानव जीवन तक सीमित नहीं है वह पंचतत्वों से श्रृंगारित हो कुछ भी हो सकती है जिसका विहंगम विस्तार समझ में आता ही नहीं है. कभी सोचा आपने कि कैसे राजा उत्तानपाद की दो पत्नियों सुरूचि और सुनीति के विवाद में राजा के बेटे ध्रुव ने विष्णु भगवान की तपस्या की और वो 1 ग्रह ध्रुव ग्रह के रूप में स्थापित हो गया था.

क्या यह सिर्फ़ एक कपोल कल्पित कथानक है या जीवन के लिए वृहतर स्तर पर प्रस्तुत करने का एक दृष्टिकोण है.

निःशब्द हो हमारा संवाद संपन्न हुआ.

4 thoughts on “मेरा पुनर्जन्म कैसा हो?

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  1. The question is not about what I would like to become in my next life.

    The question is do you want to be born again in this chaotic world and will there be a world or earth left to be reborn.

    I am saying this in light of the present war.

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  2. आपने लिखा अच्छा हैं।मेरे पापा भी बहुत किताबें पढ़ते थे। हम लोगों से उस विषय पर चर्चा करते थे।पुणे से किताबें आनलाइन बुलवाते थे। हमें किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे।आप के इस विषय संबंधी उन्होंने भी एक किताब मराठी में पुणे से बुलवायी थी।किताब का नाम मृत्यु नंतर होते तरी काय? अर्थात मृत्यु के पश्चात् क्या होता है।उस किताब में इस संदर्भ बहुत अच्छा बताया था। मृत्यु के पश्चात् तुरंत जन्म नहीं मिलता, आत्मा जन्म लेने के लिए भटकती रहती है।शरीर ढूंढती रहती है।जब तक किये हुए कर्मों का हिसाब नहीं, जन्म नहीं मिलता जब उसका फेर पुरा होता है तब नया जन्म मिलता है। इसलिए हमेशा अच्छे कर्म करना चाहिए अर्थात किसी जरूरतमंद कि मदद करना। किसी का बुरा नहीं चाहना। किसी के अच्छे वक्त या कामों पर ईर्ष्या नहीं करना। निस्वार्थ भाव से काम करना। इस तरह प्रत्येक व्यक्ति के कर्मों का हिसाब नियती करती हैं। यदि निष्कामभाव से कर्म किये हो तो निश्चित ही मोक्ष प्राप्ति होती हैं। अर्थात आगे जन्म नहीं। धन्यवाद। मेरे लिखे विचारों से कोई असहमत हो तो क्षमस्व।

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