God – Non Existing Concept!?

God – Non Existing Concept.
(English/हिंदी)

Altogether, God is a non-existing concept.
In other words, one can conceptualise, the God is existing as a non-concept.

Confused….

So the principle is hard to believe and understand the concept of God. Still, we have thoughts on Creation, Operation & Destruction of non- living materials & living materials in our conscious, subconscious and unconscious mind.

Believe it or not!

One May have a God concept on a molecular level as Proton, Neutron, Electron & Bosons for creation & Maintenance of living or non – living things. On the other hand Sun, Sirius, Canopus, UY Scuti are unimaginably huge stars & galaxies one can start thinking for existential entities in length & breadth of milkyway or universe which are extended in billions of light year distances all across. Mind can’t accommodate!

Believe it or not.

Eternal entity of these sets of galaxies in this universe represent unimaginable size. People say that’s all Science!
Yes, it is.
A baby is born out of fusion of sperm and an ovum way up in pitch dark situation in Uterus. The process is of such scientific coherence with genetic engineering to create a Baby boy or girl or puppy or even as a sapling are very much explainable.

Questions arise are, how all this process take place?

People with just inbox thinking capabilities carry forward whatever they have perceived, observed, learnt or received through their teachings, training’s & learnings remain to believe in a physical structure of God from the history.

Rightly said?
Yes!

On the other hand, people with, out of the box thinking do not get carried away with their teaching, but start thinking in metaphysical abstract way to understand the actual concept of energy propelled through millions of Cells or Stars or galaxies or planets in this grand structure of universe.

कुल मिलाकर, भगवान एक ऐसी धारणा है जो है ही नहीं! कदाचित?

दूसरे शब्दों में, कोई यह सोच सकता है कि भगवान जो है ही नहीं उसके प्रति एक अवधारणा प्रचलित है नहीं! कदाचित!

संशय का विषय!

इसलिए, भगवान के कॉन्सेप्ट पर यकीन करना और उसे समझना मुश्किल है. फिर भी, हमारे चेतन(कॉन्शस), अवचेतन(सबकॉन्शियस) और अचेतन (अनकॉन्शियस) मन में अजीव और सजीव की उत्पत्ति (क्रिएशन), संचालन (ऑपरेशन) और विनष्टीकरण (डिस्ट्रक्शन) की प्रक्रिया के बारे में विचार उत्पन्न होते हैं.

मानो या न मानो!

हर सुधि मन में आणविक (मॉलिक्यूलर) स्तर पर भगवान का एक विचार हो सकता है, जैसे सूक्ष्मतम प्रोटॉन, न्यूट्रॉन, इलेक्ट्रॉन और बोसॉन, जो जीवित या निर्जीव चीज़ों के उत्पत्ति (क्रिएशन) और संधारण (मेंटेनेंस ) के लिए हैं.
दूसरी ओर वृहत्तम सूरज, सीरियस, कैनोपस, UY स्कूटी जैसे बड़े तारे और गैलेक्सी हैं ब्रह्मांड में जो मिल्की वे या यूनिवर्स की अनंत लंबाई और चौड़ाई में मौजूद ग्रहों, धूमकेतुओं के बारे में विचार करना आरम्भ कर सकता है जो अरबों लाइट-ईयर (दूरी का मापक यूनिट) की दूरी तक फैली हुई हैं. खर दिमाग़ हो या मेधावी दिमाग, इन गूढ़ तथ्यों को समझ नहीं पाता!

मानो या न मानो।

इस यूनिवर्स में गैलेक्सी के बारे में विचारो तो लोग कहते हैं कि यह सब साइंस है.

हाँ, यह है.

एक बच्चा शुक्राणु (स्पर्म) और अंडाणु (ओवम) के युग्मन (फ्यूज़न) से गर्भाशय (यूटरस) में बहुत ऊपर, बहुत अंधेरे में पैदा होता है. यह प्रक्रिय जटिलता हो जेनेटिक इंजीनियरिंग के साथ इतना साइंटिफिक तालमेल रखता है कि एक बच्चा लड़का या लड़की या पपी या एक पौधे के रूप में पैदा होता है, यह बहुत आसानी से समझाया जा सकता है, भ्रूण विज्ञान के माध्यम से!

सवाल उठता है कि यह सब प्रोसेस कैसे होता है?

जिन लोगों की सोच संकुचित होती है, वे अपनी शिक्षाओं, ट्रेनिंग और सीखों से जो कुछ भी महसूस करते हैं, देखते हैं, सीखते हैं या पाते हैं, उसे आगे बढ़ाते हैं और इतिहास से भगवान के फिजिकल स्ट्रक्चर में विश्वास करते हैं.

सही कहा?
हाँ!

दूसरी ओर, भिन्न सोच वाले लोग अपनी शिक्षाओं से बहकते नहीं हैं, बल्कि यूनिवर्स की इस बड़ी संरचना में लाखों सेल्स या सितारों या गैलेक्सी या ग्रहों से निकलने वाली एनर्जी के असली कॉन्सेप्ट को समझने के लिए मेटाफिजिकल एब्स्ट्रैक्ट तरीके से सोचना शुरू कर देते हैं. और जीवन से लेकर ब्रह्मांड तक के विभिन्न अवयवों के संबंध में एक विलग राय स्थापित करते हैं.
पर, मूल प्रश्न वहीं का वहीं रहा कि ईश्वर कहाँ हैं?
ईश्वर कैसे हैं?
ईश्वर का आदि और अंत क्या है?

जटिल है यह सोच और उस पर सवार विचार!

विचार कीजिएगा !!!!

Dr Vikas Shihurkar says like this

प्रिय अनिल,
साधुवाद, जैसे अनंत और सीमित दो घटक हैं वैसे ही ईश्वर और नश्वर दो घटक हैं। नश्वर का आदि है, विकास है और अंत है, यह परिवर्तनशील है किन्तु जड़ है (आश्चर्य) और ईश्वर जो है वह अपरिवर्तनीय है अनादि और अनंत है किन्तु चैतन्यमय है (आश्चर्य).
तो फिर इस सृष्टि का आधार क्या है, इस अपूर्ण का आधार अपूर्ण तो नहीं हो सकता । और यदि वह पूर्ण है तो उसका manifestation अपूर्ण क्यों है।
कदाचित इसलिए शंकराचार्य जी ने इसे अद्वैत कहा है ( एकोहम द्वितीयोनास्ति) । जब हम जागते हैं तब अद्वैत को ही पाते हैं। अनंत को सीमित से कैसे खोजें, वह खोज अपूर्ण ही होगी।
इसलिए गागर का सागर में विलय जहां मैं समाप्त होकर ब्रम्हमय हो जाता है (अहं ब्रम्हास्मि) अंतिम परिणीति है।
और फिर वह महान कवि शैलेंद्र का प्रश्न दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई तूने काहे को दुनिया बनाई। क्योंकि महान अष्टावक्र भी कहते हैं कि तुम वही हो जिसे तुम बाहर खोज रहे हो।
विकास 🙏

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अनिल कुंमार भदौरिया पेशे से चिकित्सक है और मध्य प्रदेश शासन में सेवारत हैं.

स्वास्थ्य शिक्षा के संबंध में चिकित्सक भदौरिया की विशेष रुचि है और जीवनशैली रोगों के प्रभावी उपचार के साथ फर्स्ट एड, यौन शिक्षा व CPR के प्रशिक्षण सत्रों में भी सम्मिलित रहते हैं.

सेक्स एजूकेशन नामक पुस्तिका प्रकाशित हो चुकी है. कवि हृदय डॉ. भदौरिया अपने यात्रा वृत्तान्त और कहानियों के संग्रह की तीन अन्य पुस्तकें भी प्रकाशित कर चुके हैं. हेल्दी-बुक नामक पुस्तक प्रकाशनाधीन है.

  1. Sex Education by Peacock Books
  2. दृष्टिदृश्य दृष्टा देवांश – पद्य संग्रह

3.अथ कथा यात्रायाम – गद्य कथा संग्रह

  1. सेक्स शिक्षा – हिंदी में यौन शिक्षा
  2. ज़मीन पर मेरे कदम – यात्रा वृतांत

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