God – Physical or Metaphysical?
अद्वितीय है
अनिर्वचनीय है
असाधारण है
अकल्पनीय है
अजेय है
अवर्णणीय है
अकल्पनीय है
अविस्मरणीय है
अविश्वसनीय है
अतुल्य है
अभूतपूर्व है
ईश्वर की अवधारणा कपोल कल्पित प्रतीत होती है जो मानव मन की उड़ती हुई परिकल्पना की उत्पत्ति है.
क्यूंकि जिसे देखा नहीं उसे माना कैसे जाए?
जटिल है परंतु सोचा कि सोचना आरंभ किया जाए तो ईश्वर की सत्ता पर कुछ विचार इस प्रकार किया जा सकता है.
देखा जाए तो ईश्वर की गणना में सर्वप्रथम “समय” याने काल का विशेष स्थान है और इसी लिए महाकाल की अनुभूति को ईश्वर तुल्य माना गया है चूंकि समय का कोई रूप स्वरूप नहीं है इसी लिए काल को या महाकाल को अनादि से अनंत की अवधारणा में स्वीकार किया गया है. अर्थात काल प्रभुस्वरूप है.
ईश्वर की अवधारणा में द्वितीय स्थान “शक्ति” का प्रस्तुत होता है जो सूर्य के प्रकाश रूप में भी पूर्ण ब्रह्मांड को प्राप्त होता है. शक्ति रूपेण कल्पना में मां शक्ति दुर्गा की स्वीकार्यता भारतीय जन समाज में अनादिकाल से उपस्थित है जो ईश्वर स्वरूप को प्रस्तुत करती है. अर्थात् शक्ति या ऊर्जा प्रभुस्वरूप है.
काल और शक्ति के पश्चात ईश्वर शुरू हुई लीला रूपी संशय को दूर करने में सहायक है तो वह यह माया. त्रतीय स्तर पर माया की लीला की परिभाषा कुछ इस प्रकार से भी जा सकती है कि प्रमाण स्वरूप में भी प्रकृति लीला जो है तो साकार रूप में परंतु नहीं हैं. साकार रूप में भारतीय मानस में विष्णु और लक्ष्मी के माया लीला (धन, वैभव, यश एवं कीर्ति) के प्रसंग में ब्रह्माण्ड परिसंचालन का उत्तरदायित्व में होने की प्रस्तुति करता है.
अब समग्र रूप से यदि आप देखें तो काल रूप में भगवान शिव, शक्ति रूप में मां दुर्गा और माया रूप में भगवान श्री विष्णु की परिकल्पनाएँ मूर्त रूप में प्रस्तुत होती दिखाई पड़ती है. बचपन से यह संशय मेरे मन में प्रश्न रूप में उत्पन्न होता था. ये मूर्त रूप साधारण मानस की जिज्ञासा पूर्ति हेतु हमारे पूर्वजों के द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत हैं जो भाविक और मानसिक संतुष्टि के साथ धनात्मक विचारधारा के सहायक हैं.
सच भी हो कदाचित!
इस पृथ्वी की और प्रकृति की रचना की सार्वभौमिक तथा अलौकिक शक्ति कौन है, कैसी है, कहाँ है, सर्वव्यापी है जीव-मात्र की कोशिकाओं में उपस्थित है.
प्रश्न यह भी है कि क्या सार्वभौमिक सत्ता साकार रूप में है या निराकार रूप में है या मात्र मानसिक अवधारणा है.
तो ईश्वर का क्या स्थान है ? प्रथम श्रेणी साकार रूप से ईश्वर को स्वीकार करने की है ! साकार ऐ रुको प्रकृति जन्य होकर पहाड़, पेड़, नदी, पंचतत्व में स्थापित हो सकता है या मानव निर्मित विकसित मूर्त रूप में पत्थर रचना य पुस्तक रूप में उपस्थित हो सकता है जो मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे अथवा चर्च में किसी भौतिक रूप में प्रस्थापित हों.
जब कुछ बुद्धि का विकास हो जाए तब अंतर्मन की जागृति आरंभ हो निराकार रूप की प्रस्तुति स्वीकार होने लगती है. यह द्वितीय स्तर की श्रेणी प्रतीत होती है और जब व्यक्ति जाग्रत हो जाए कुण्डलीनी जग जाए तब जाग्रत मन काल, शक्ति और माया से सीधे साक्षात्कार कर सकता है!!!
आश्चर्यजनक है ना!
ईश्वर का मन में विचार ही,
अद्वितीय है
अनिर्वचनीय है
असाधारण है
अकल्पनीय है
अजेय है
अवर्णणीय है
अकल्पनीय है
अविस्मरणीय है
अविश्वसनीय है
अतुल्य है
अभूतपूर्व है.

मेरे अनंत बाल सखा डॉ आशीष जोशी ने लिखा है-
आनंद लीजिए
स्वभावत: ही यह हुआ होगा … ऐसा जानकर ही इस रंग का सद्भाव हुआ है ।
ग्रे एरिया ।
रंग भी ग्रे और प्रदर्शन भी ग्रे …
धुमैला … या धूसर … क्या रंग चुना गया है ये कथन ने स्वयं ही । अद्भुत !!
“क्यूँकि जिसे देखा नहीं उसे कैसे माना जाए !”
विनम्र निवेदन है-
प्रमाण के दो स्तर हैं मित्र –
एक ज्ञान-स्वरूप दूसरा विज्ञान-स्वरूप ।
विज्ञान-स्वरूप में परीक्षण एवं निष्कर्ष होगा ज्ञान मे अनुभव ही प्रमाण होगा ।
जिसे देखा नहीं … यह एक इन्द्रिय प्रश्न है ।
जिसे देखा नहीं , उसे कैसे माना जाए ? यह दैवीय जिज्ञासा है ।
मानना , स्वयं में एक ऐसी स्थिति है जिसमें बुद्धि से परे होकर चित्त की प्रवृत्ति होती है । Inclination without Intention !
यह है मानना ।
यहाँ अनुभव भी प्रमाण है एवं पुनरावृत्ति स्वयंभू है ।
निरंतर एवं वृत्ति की भावना ही जिज्ञासा को जन्म देती है तथा वहीं धूमिल / धूम्र की तरह प्रतीत होती है ।
ग्रे एरिया !
यहाँ ईश्वर की परिकल्पना या कल्पना ही प्रमाण-स्वरूप उपस्थित होती है । अन्य कोई वस्तु हो नहीं सकती ।
बिग-बैंग के पहले क्या उपस्थित था ? क्या स्वरूप था ? किस प्रयोजन हेतु था ?
ऐसे प्रश्न घनत्व या पदार्थ में परिभाषित हो ही नहीं सकते … ग्रे एरिया !
तुमने जिज्ञासा प्रकट तो की है , उत्तर भी सम्मुख रहा होगा तुम्हारे – तुम स्वयं ही चेतन हो , यह भी ज्ञात है मुझे । यहाँ होलिकादहन के यथार्थ की ज्वाला में यह शब्दानुवाद हुआ है … कदाचित् प्रश्न एवं प्रेम का द्वंद्व ही है !
गणपति अथर्वशीर्ष की रचना में –
सहस्त्र अनुवर्तने यम यम काम अधिते
तम तमन्नेनसाध्यते …
हम इस संदर्भ की विवेचना ही क्यूँ कर रहे हैं ? क्या हम किसी प्रयोजन हेतु इस साक्ष्य की विवेचना में लीन हुए हैं ?
यदि हुए हैं तो प्रयोग ही असाध्य होगा ।
साकार ईश्वर तथा निराकार शक्ति की कल्पना अथवा सम्यक-कथन ही निर्रथक है । दोनों में द्वैत का कोई भेद नहीं – वे अद्वितीय एवं अद्वैत ही हैं ।
व्यक्तिगत रूप से पूछोगे तो मैं अद्वैत वेदांत से सहमत तो नहीं रहूँगा … लेकिन इस विषय का विस्तार तुमसे प्रत्यक्ष होकर ही समाधान अथवा शास्त्रार्थ पर निर्भर होगा ।
यम् वेद: । इत्यउपनिषद: !
🙏 ———————————-
मेरे शिक्षक डॉ अनिल जोशी का कथन
मुझे तो ऐसे अनुभव हुआ ये पढते हुए जैसे ये भागवत गीता के विभूती योग अध्याय का ही व्याख्या हो.🙏
———————————————
अनिल कुंमार भदौरिया पेशे से चिकित्सक है और मध्य प्रदेश शासन में सेवारत हैं.
स्वास्थ्य शिक्षा के संबंध में चिकित्सक भदौरिया की विशेष रुचि है और जीवनशैली रोगों के प्रभावी उपचार के साथ फर्स्ट एड, यौन शिक्षा व CPR के प्रशिक्षण सत्रों में भी सम्मिलित रहते हैं.
सेक्स एजूकेशन नामक पुस्तिका प्रकाशित हो चुकी है. कवि हृदय डॉ. भदौरिया अपने यात्रा वृत्तान्त और कहानियों के संग्रह की तीन अन्य पुस्तकें भी प्रकाशित कर चुके हैं. हेल्दी-बुक नामक पुस्तक प्रकाशनाधीन है.
- Sex Education by Peacock Books
- दृष्टिदृश्य दृष्टा देवांश – पद्य संग्रह
3.अथ कथा यात्रायाम – गद्य कथा संग्रह
- सेक्स शिक्षा – हिंदी में यौन शिक्षा
- ज़मीन पर मेरे कदम – यात्रा वृतांत
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ईश्वर के विषय में किसी भी प्रकार कोई टिपण्णी करना व्यर्थ हे इस पर बुद्धा हमेशा मोन रहे हे उन्होंने कहा हे आयो ओर स्वम देखो सारी धारणायो को अलग रख कर.। कुछ प्रश्न अनुतरित हे केवल जानो मानो मत।
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True
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अद्भुत विचार प्रकट किया आदरणीय आपने तो.
विचार, प्रतिक्रिया, प्रत्युत्तर या भड़ास जो कुछ समझें आप मैंने तो सबसे ही माँग की है. ओशो लिखते हैं पूरी जवानी संभोग के समय एगोलेसनेस और टाइमलेसनेस को अनुभव करता है और बुढ़ापे में भगवान खोजता है
जबकि ईश्वर का ऐब्सट्रैक्ट उपस्थिति भाव सदा से मानव मन में शरीर में प्रकृति में सदा से उपस्थित है
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अद्भुत विचार प्रकट किया आदरणीय आपने तो.
विचार, प्रतिक्रिया, प्रत्युत्तर या भड़ास जो कुछ समझें आप मैंने तो सबसे ही माँग की है. ओशो लिखते हैं पूरी जवानी संभोग के समय एगोलेसनेस और टाइमलेसनेस को अनुभव करता है और बुढ़ापे में भगवान खोजता है
जबकि ईश्वर का ऐब्सट्रैक्ट उपस्थिति भाव सदा से मानव मन में शरीर में प्रकृति में सदा से उपस्थित है
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साधौ, यह विषय गहरा दार्शनिक और वैचारिक है।जिसे आपने बेहद गहराई से समझने का प्रयास किया है। साधुवाद के पात्र हैं। ‘ईश्वर क्या है’ , यह मानव के लिए सबसे जटिल प्रश्नों में से एक है। यह केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि दर्शन, मनोविज्ञान, विज्ञान और समाजशास्त्र से जुड़ा प्रश्न है। जिनके मत में ईश्वर मानव की कल्पना है, उनके अनुसार ‘वो’ भय, असुरक्षा के कारण जन्मी हुई मन की धारणा है। दूसरी ओर,हम जैसे ईश्वर को परम सत्य मानते हैं— एक ऐसी सत्ता जो सृष्टि की रचना, संचालन और नैतिक व्यवस्था का आधार है। पौराणिक ग्रंथ ईश्वर को निराकार, सर्वव्यापक और चेतन सत्ता के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यहाँ ईश्वर केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि जीवन के उद्देश्य से जुड़ा और उन्हें प्राप्ति का माध्यम है। यह आस्था और विश्वास का चरम है। तो वास्तव में, ईश्वर का प्रश्न पूरी तरह तर्क से सिद्ध या असिद्ध नहीं किया जा सकता है, मात्र अनुभूति से समझ सकें, यही सार है।🙏
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अदभुत लिखा है आपने आदरणीय
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