खुले मैदान में
दौड़ता चला जाता हूँ
मैं वो छोटा सा बच्चा
हवा से निर्मल हो जाता हूँ

जैसे कोई बन्धन नहीं
ख़ुश खुले नभ के नीचे
यूं ही, यत्र तत्र सर्वत्र
ऊर्जा से प्राणवायु खींचे
मेरी मुट्ठी में है जहाँ
माता पिता मेरे पीछे
लचकता मटकता मैं
कभी ऊपर कभी नीचे
छल घृणा से परे
मित्र बनाएँ खूब
संग ज़मीन पर लोटते
मस्ती अकूत दूब
समंदर सा मन था मेरा
नित्य प्रति मैदान में खेलने जाए
खेल में हारा कभी आसानी से
तो कभी मुश्किल से जीता जाए
कभी गेंद मारी तो
बल्ला चलाया यदाकदा
हॉकी खेली कभी तो
फुटबॉल में ख़ूब दौड़ा-भागा
हारा जब तो मन ख़ूब रोया
खेलने लेकिन फिर आया
जीता तब जब मैं लौट के आया
समझी यूं जीवन की माया
पिता मेरे बने रोल मॉडल
तो मम्मी मेरी सदा देवी
पालन पोषण हो जो संस्कारी
तो सफल हो जीवन की वेदी
अनिल कुंमार भदौरिया पेशे से चिकित्सक है और मध्य प्रदेश शासन में सेवारत हैं.
स्वास्थ्य शिक्षा के संबंध में चिकित्सक भदौरिया की विशेष रुचि है और जीवनशैली रोगों के प्रभावी उपचार के साथ फर्स्ट एड, यौन शिक्षा व CPR के प्रशिक्षण सत्रों में भी सम्मिलित रहते हैं.
सेक्स एजूकेशन नामक पुस्तिका प्रकाशित हो चुकी है. कवि हृदय डॉ. भदौरिया अपने यात्रा वृत्तान्त और कहानियों के संग्रह की तीन अन्य पुस्तकें भी प्रकाशित कर चुके हैं. हेल्दी-बुक नामक पुस्तक प्रकाशनाधीन है.
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3.अथ कथा यात्रायाम – गद्य कथा संग्रह
- सेक्स शिक्षा – हिंदी में यौन शिक्षा
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बहुत सुंदर रचना
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