दग़ा किसी का सगा नहीं है न मानो तो कर देखो, जिसने जिस से दग़ा किया जाके उसके घर देखो…
ऐसी एक पुरानी कहावत घर – घर कही जाती थी और
ऐसा कोई घर नहीं है जिसने धोका न खाया हो.
कहने को तो धोका विश्वास पर होने वाली क्षति है परंतु क्या विश्वास भी धोका है ?
और धोखा भी विश्वास है !
एक जीवन काल में इन दो नैसर्गिक परंतु अकाल्पनिक स्थितियों से दो-चार होना ही पड़ता है और विश्वास तो करना ही पड़ता है. जब आप आँख बंद कर ट्रेन में सवार हो ट्रेन के चालक पर विश्वास करते हैं कि वह हमें गंतव्य तक पहुँचाएगा तो होता है ना अप्रतिम विश्वास!
है ना!
विश्वास कीजिए तो कभी कभी वो कहते हैं, ऐसा कोई सगा नहीं जिसे हमने ठगा नहीं!
स्वार्थ की भावना, स्त्रोत है ठगने की भावना की. वह तो नैतिकता कभी कभी आड़े आ जाती है नहीं तो धन का लोभ, वासना, क्रोध, मद और सजा देने की चाहत विश्वास का खून कर धन से, शरीर दोहन से, सट्टा लोलुपता से ठगने के मौसम खड़े कर देती है.
धोका या ठगना, विश्वास का खंजर है जो सदैव ही पीठ पर भोंका जाता है!
कभी. . . कहीं, धोका भी मित्रता में विश्वास कर अपनी नैसर्गिक निष्ठा के साथ प्रस्तुत होते हैं तब एक अन्य पुरानी कहावत स्मरण में आती है….
सोना जाने कसे तो मनवा जाने बसे.
अर्थात् मानवी मानस को समय की कसौटी पर कसे जाने पर कलदार खरे सिक्के या रांगे के खोटे सिक्के जैसे रूप की पहचान हो पाती है, वैसे ही जैसे सोना एक कसौटी के पत्थर (Touchstone to judge purity of gold) पर घिस कर असली नकली की परीक्षा पास करता है.
भरोसा और धोका एक ही सिक्के के दो पक्ष हो कदाचित शायद परंतु धोका हृदय को विदीर्ण कर देता है तो विश्वास हृदय को प्रदीप्त कर देता है.
कहने को तो विश्वास किसी भी नवजात शिशु के उम्र से लेकर अंतिम सांस तक चलने वाली प्राकृतिक घटना है. सूरज के उगने पर विश्वास है, माता पिता पर विश्वास है, जीवन पर विश्वास है और आस्तिक को कदाचित ईश्वर विश्वास है कुछ इस प्रकार प्रस्तुत होता है जो ऊर्जा की मानिंद जीवन को आलोकित करता है.
नास्तिक के लिए भी ईश्वर की उपस्थिति का न होना भी एक विश्वास है जो उसके लिए ऊर्जा का स्रोत है.
प्रकृति (भगवद् लीला )और पुरुष (ऊर्जा) की परिभाषाओं के संशय के मध्य, जीवन विश्वास की नाव पर सवार हो समय की नदी पर चलता है.
और इस चलती विश्वास की नाव में जब छेद हो जाए तो विश्वास की नाव डूब जाती हैं. विश्वास ईश्वर है, प्रकृति है पुरुष है, ऊर्जा है तो धोखा भी है ना मानो तो मानो तो.
दगाबाज दोस्त साथ छोड़ दें
तो
राह बहुत आसान हो जाती हैं।
सत्यता, दृढ़ता आदि का ज्ञान होने के कारण मन में उत्पन्न होने वाला भाव ही विश्वास है. यह किसी सिद्धांत या किसी व्यक्ति के गुणों आदि का निश्चय होने पर उत्पन्न होता है.

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