Apprenticed to Himalaya masters.

हिमालय वासी गुरु के साये में
एक योगी का आत्मचरित
लेखक- श्री एम
इस जीवन की परिभाषा को समझना एक कठिन दौर है जिसका उद्देश्य, एक पहेली को सुलझाने की भाँति है और स्पष्ट है.
जीवन का उद्देश्य क्या है ?
क्या जीवन निरुपाय हैं ?
या जीवन एक मौक़ा है जो काल के इस दौर में सामाजिक आर्थिक और पार्थिव उन्नति के साथ साथ आध्यात्मिक उन्नति के अवसर उपलब्ध कराता है ?
यह सब अति विचार का विषय हो कदाचित् किसी भी सुधि मानव के लिए जो जीवन को शरीर से बाहर की ओर देखने के साथ साथ अंतर्मन को भी देखने का प्रयास करें.
ऐसे ही प्रयास के संदर्भ में 1 आत्मकथा पढ़ने का तीसरी बार अवसर हुआ जिसका लोभ संवरण नहीं कर पाया. एक बार अंग्रेज़ी में तथा दो बार हिंदी में पढ़ चुकने के बाद भी जीवन के रहस्यों के प्रति मेरी जिज्ञासा शांत न होने पाई कि किस प्रकार जीवन उपरांत जीवन, काल प्राप्त काल, जन्म उपरान्त जन्म के दौर को पार करते हुए कहीं हम माया के जाल में उलझ तो नहीं जाते हैं. जिस माया की चौपड में खेलते हुए हारते – जीते हुए अंततोगत्वा जीवन के उद्देश्य की परिभाषा को जाने बिना, जीवन हार जाते हैं.
कदाचित मेरे कथन बहुत आध्यात्मिक और दर्शन से पीड़ित प्रतीत होते हों परंतु पूज्य संत श्री मधु अर्थात् श्री एम अर्थात मुमताज़ अली की कई पुस्तकों में से मुझे व्यक्तिगत रूप से प्रिय यह आत्मकथा पुस्तक “हिमालय प्रवासी गुरू की शरण में” का अनुभव किसी भी समय पढ़ने में पारलौकिक शक्तियों से आश्चर्यचकित तो करता ही है मानव शरीर की अलौकिक शक्तियों के संदर्भ में भी ना केवल परिभाषित करने का प्रयास करता है बल्कि जाग्रत करने के लिए भी अंतर्मन की ओर यात्रा करने के लिए भी प्रयास करता है
आत्मकथा आधारित पुस्तकों को पढ़ना जीवन के एक अनुपम अनुभवों के रूप में प्रस्तुत होता है जो लेखक द्वारा रचित रचना के अतिरिक्त उसके द्वारा बिताए गए जीवन के अनुभवों का लेखन भिन्न प्रकार से हैं जो पाठक को विचलित करने में समर्थ भी होता है कि कितनी मेहनत, कितना दृष्टिकोण, कितनी दूरदृष्टि के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना को जाग्रत करने का प्रयास किया गया है या वित्तीय सफलता हासिल की गई और भौतिक या आध्यात्मिक जीवन को सफल बनाने का प्रयास किया गया, ना स्वयं के लिए बल्कि समाज के लिए दूसरों के लिए भी!
इस पुस्तक को पढ़ने का अनुभव वो जादू और फैंटेसी है कि इसमें चलचित्र के दर्शन का चित्रण प्रतीत होता है जिसमें लेखक श्री एम अपने पूर्व जन्मों के पाप कर्मों का संक्षिप्त विवरण तो प्रस्तुत करते ही हैं इस मानवीय योनि में अवतरण को सार्थक बनाने की अपने प्रयासों और सार्वभौमिक सत्ता के माध्यम से सामाजिक जागरूकता को स्थापित करने के प्रयासों को भी प्रस्तुत करते हैं.
मेरे कुछ भी लिखे जाने से इस पुस्तक की सरल भाषा मैं विस्मित करने वाले उदाहरण, गुरु-शिष्य परंपरा के अंतर्गत मैत्रीपूर्ण संवाद की यात्रा के वृतांत , पारीवारिक व्यवस्था को एकाग्र चित्त हो अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विभिन्न गुरुओं, लब्ध साधुओं और ज्ञानियों की ज्ञान विधाओं के साथ भेंट वार्ता के परिदृश्यों को पढ़ते सुनते ऐसा प्रतीत होता है कि जीवन का उद्देश्य निरुपाय नहीं है यदि प्रयास समग्र रूप से किये जाए. यदि ईश्वर की ओर मानव योनी में एक क़दम प्रेम के भाव के साथ बढ़ाया जाए तो ईश्वर दो क़दम आगे बढ़ो गले लगाने को निश्चित रूप से तैयार होते हैं.
भारतीय संत परंपरा में शुद्ध रूप से परिष्कृत उन्नत और साधु भाव की उच्चतम श्रेणी के वाहक श्री गुरु बाबा जी और उनके शिष्य महेश्वर नाथ बाबा जी और जे कृष्णमूर्ति जैसी महाभूत विभूतियों के समक्ष में दर्शन कर वार्तालाप करने के जो उदाहरण प्रकाशित है वे साधारण मानवी को आश्चर्य चकित करने के लिए सक्षम तो है ही कहीं अवचेतन मन में यह भाव भी उत्पन्न करने में सहायक होते हैं कि ईश्वर प्राप्ति योग्य है कि यदि कलियुग के इस दौर में लोभ,अहंकार, बैर, वासना, मद, क्रोध जैसे अघोषित यथा मलिन गुरुओं का साथ त्याग दिया जाए तो शांत स्वभाव के अनिंद्य कुलीन गुरुओं की प्राप्ति संभव है.
प्रश्न सिर्फ़ जागृति का है दृष्टिकोण का है एकाग्रचित्त दृष्टि का है जो इस पुस्तक के माध्यम से मनन योग्य रही है जो चेतन, अवचेतन, अचेतन मन की थी इसी बिंदुओं को उत्तेजित करने में सक्षम होता है.
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