Gratitude (Blog 472)

जीवन की रसभरी धार ज़हर और अमृत दोनों से भरी हुई होती है और कर्मों के खाते के अनुरूप मां पिता धन स्वास्थ्य इत्यादि की प्राप्ति का कौन सा कैसा अबूझा विज्ञान भाग्य में अवतरित होता है, समझने में असंभव जैसी स्थिति को प्रस्तुत करता है.

मेरे एक मित्र है. एक दिन फ़ोन कर बोले कि अनिल मेरे बड़े भाई ने मुझे पिताजी की भाँति संभाला और पढ़ाया है इस बार उनके 75 वें जन्मदिवस पर आयोजित कार्यक्रम में मैं कुछ कहना चाहता हूँ. कार्यक्रम शहर से बाहर एक होटल में परिजनों के बीच आयोजित हैं और मेरे जीवन के उतार-चढ़ाव, लाभ-हानि और धर्म -कर्म से संबंधित एक भाषण तैयार कर दो तो मैं परिजनों के बीच वह कहना चाहता हूँ.
तो यह भाषण फिर तैयार हुआ जिसे आज आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं.

…आज हम सब एक विशेष पारिवारिक प्रयोजन से यहाँ एकत्र है और मैं बहुत भावुक हूँ कि आज हम हमारे परिवार के अग्रणी और पिता सामान अग्रज की पचहत्तरवीं जन्मदिवस पर एकत्र हुए हैं
मैं मात्र छह माह का था जब मेरे पिता नहीं रहे थे तो मेरे लिए तो यह जीवन लगभग सूना ही था और मेरी माँ के आँचल में अकेला ही था.
देश का वह एक ऐसा दौर था जब आर्थिक तंगी, निराशा और असफलता जैसे कारणों का हम भारतीयों के लिए चोली और दामन का साथ था और परिवार में सबसे छोटे भाई के लिए किसी की भी कल्पना में ऐसा दुख का समय हो सकता है कि इस निर्मल बच्चे का क्या होगा ?

परंतु मैं भाग्यशाली था.

आज मैं उन दिनों की कल्पना कर सकता हूँ कि मेरे बड़े भाई ने जब मेरे पिता के देहांत के दिन मुझे अपनी गोदी में लिया होगा तभी उन्होंने यह प्रण किया होगा कि इस बच्चे का सब कुछ मैं हूँ और इस अनुज के जीवन में पिता के पद की कमी कभी नहीं होगी.
अगर मैं यह कहूंगा कि वो 10 बरस की उम्र में ही वे मेरे पिता बन गए हैं तो यह बात किसी भी स्थिति में अतिश्योक्ति न होगी और मैं आज भी यह बात गर्व के साथ महसूस करता हूँ मैं बड़े भाईसाब में अपने पिताजी को देखता हूं.
समय का एक नियम है कि यह बिना रुके बहता जाता है
1980 में उन्नीस साल की उम्र में मैं मेरा एडमिशन ग्रह-नगर इंदौर से दूर जबलपुर मेडिकल कॉलेज में हुआ उस दौर में जब सुविधाएँ कम होती थी और धन बहुत सोच समझ कर खर्च करना होते थे.
मैं अकेला जबलपुर में बहुत अकेला हो गया था और जब जब मेरे बड़े भाईसाब मुझे मिलने जबलपुर आते थे और मेरा हौसला बढ़ाने के साथ साथ मेरी ऊर्जा को भी पुनर्जीवित करते थे.
हमारे परिवार में कई डॉक्टर है और मैं आज आपको एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ आपके शरीर में सबसे महत्वपूर्ण अंग कौन सा है?
इस प्रश्न का उत्तर कोई मस्तिष्क बोलेगा कोई हृदय बोलेगा कोई नेत्र बोलेगा कोई लिवर बोलेगा कोई हड्डी बोलेगा कोई मांसपेशी बोलेगा लेकिन मैं आज आपको बताता हूँ कि आपके शरीर में सबसे महत्वपूर्ण अंग आपका कंधा है

आपको आश्चर्य हो सकता है कि मैं ऐसी कैसी बात कर रहा हूं

हम जब जीवन जीते हैं तो भगवान जी ने हमें आदर्श व्यवस्था शरीर में बना के दी है परंतु जब हम कष्ट में होते हैं दुख में होते हैं अकेले होते हैं संघर्ष में होते हैं उस स्थिति में है आपको जिस की ज़रूरत होती है वो होती है एक कन्धा जिसके ऊपर सर रखकर आप अपना दुख कम कर सकते है और मैं आपको आज बता रहा हूँ
मेरे जीवन का अमूल्य कंधा मेरे भाई और परिवार ही है जिन्होंने मेरे हर कष्ट के दौर में अपना कंधा मुझे अपना सर रखने के लिए दिया है ताकि मैं अपने संघर्षों से लड़ के पुनः खड़ा हो सकूं और आगे बढ़ सकूँ

बड़े भाईसाब न केवल मेरे आदर्श हैं बल्कि वे हमारे पूरे परिवार के आदर्श हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन इस तरह से परिवार को बनाने में समर्पित किया है कि जिस क्यों शब्दों में कह पाना यह लिख पाना असंभव है
आज मैं द्रवित हूँ और मेरी आँखों में आपके मेरी आँखों में और हृदय में आपके प्रति कृतज्ञता का एक अनमोल भाव है जिसे मैं आज व्यक्त करता हूँ और
मैं यह अत्यंत कृतज्ञ भाव से कहना चाहता हूँ कि मैं हमेशा आपका छोटा भाई ही बने रहना चाहता हूँ और आगे के जन्मों में भी मैं आपको अपने बड़े भाई के रूप में पाना चाहता हूँ ताकि मुझे आपका प्रेम आशीर्वाद और वह कंधा मिल सके जो आपने मुझे हमेशा दिया है
भाई साहब आप शतायु हो और आपकी हर मनोकामना सदैव पूर्ण हो
आज मुझे मेरे माता और पिता की अत्यंत याद आ रही है मैं उनसे भी आवाहन करता हूँ कि आज उनका भी आशीर्वाद आपको और समस्त परिवार को सदैव की भाँति मिले….

इति

मेरे मित्र ने बाद में बताया कि इस भाषण को पढ़ने के बाद मैं और मेरी पत्नी दोनों रोये और जब इस अभिव्यक्ति को मैंने परिजनों के बीच व्यक्त किया तो परिवार के सभी सदस्यों की आंखें नम थीं और समाज की अवधारणा में परिवार की धरोहर की सिद्धांत का सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण सहजीवन ही है जिसमें एक दूसरे का सहारा लेकर आदमी केंद्रीय परिवार, संयुक्त परिवार, विस्तृत परिवार विकास करता है तरक़्क़ी करता है उन्नति करता है और पृथ्वी पर अपने जन्म के मूल उद्देश्यों को पूरा करते हुए अपनी यात्रा समाप्त करता है.

इति कथा यात्रायाम

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