Protection!

संवाद, हेलमेट की दुकान पर-

छात्र – बड़े भाई, एक हेलमेट खरीदना है?
विक्रेता – हाँ जी, बिल्कुल. कोई ब्रांड विशेष!

छात्र- नहीं जी, इतना मजबूत हो कि बस सिर सुरक्षित रहे.
विक्रेता – सही कहा. आप तेज गाड़ी तो नहीं चलाते हो!

छात्र- गाड़ी तो मेरे पास है ही नहीं!
विक्रेता – अरे तो हेलमेट क्यों ले रहे हो.

छात्र- कॉलेज में पढ़ता हूं. और मित्र की बाइक पर बैठ इधर उधर जाना होता है. ड्राइवर के पास तो हेलमेट रहता है. पीछे बैठे सवार के लिए बाइक-मित्र के पास हेलमेट क्यों ही होगा.!
विक्रेता – सही सोचा आपने.

छात्र- मैंने कल हेड इंजरी से एक मरीज को अस्पताल में देखा था. पूरा सिर उधड़ा हुआ जिसे सिर्फ एक हेलमेट बचा सकता था.
विक्रेता – हाँ बेटे, हम अपने लिए अलग अलग लाख रुपए का लैपटॉप, लाख रुपये का मोबाइल और दो लाख की बाइक तो ले लेते हैं , हज़ार – पंद्रह सौ का हेलमेट महंगा लगता है.

छात्र- जी बड़े भाई, मैंने देखा है कि बाइक पर पति महोदय तो हेलमेट पहने रहते हैं, उनकी पत्नी और बच्चे खुले सिर आवागमन करते है. जरा सी निगाह हटी कि दुर्घटना घटी.
विक्रेता – सही बोले बेटे. जानते हो दुनिया में सबसे बड़ा नशा कौन सा है?

छात्र- नहीं!
विक्रेता – जवानी का नशा. उससे बड़ा कोई नशा नहीं. इस नशे के प्रभाव में आकर्षक और ताकतवर बाइक, अच्छी सड़क और रगों में बहता युवा और उत्तेजक हॉर्मोन सब कर्म करा लेता है. आप कितने भी कुशल चालक बन जायें सड़क पर रपट गए तो रगड़ ही नहीं लगेगी बल्कि सलट जाने का मौसम बन जाता है.

छात्र- जी समझा नहीं?
विक्रेता – वाहन गति संतुलित नहीं होगी तो दुर्घटना होने की संभावना अत्यधिक होगी. और उस स्थिति में अस्पताल या श्मशान दोनों की यात्रा यमदर्शन तुल्य है. अस्पताल के खर्चे लंबे समय तक शारीरिक और आर्थिक कष्ट देते है और श्मशान की जवान यात्रा पीछे जीवित रह गए परिजनों को लंबे समय तक कष्ट देते हैं.

छात्र – जी, सही कह रहे हैं. स्वयं पुलिसिंग ही एकमात्र उपाय है, सड़क पर सुरक्षित परिचालन का.
विक्रेता- ये लो बेटा, अच्छा हेलमेट जस पर मैंने तुमको दो सौ रुपए की छूट भी दी है. जाओ मजा करो. शुभाशीष. तुम अकेले समझदार होगे नगर में जिसके पास हेलमेट है परंतु बाइक नहीं है चलाने को.

Sumukh Dashputre: इस पर आपके विचारों से अवगत करवाईएगा l
Rajesh Kumar Sinha: मेरी दृष्टि में इस संवाद की विशेषता यही है कि यह किसी उपदेशात्मक शैली के बदले एक साधारण सी घटना के सहारे पाठक के सामने समाज की एक बड़ी विडंबना रख देता है। हम मोबाइल के कवर, जूते, ब्रांडेड कपड़े या बाइक के एक्सेसरीज़ पर बिना सोचे पैसे खर्च कर देते हैं, लेकिन जब बात हेलमेट जैसे जीवनरक्षक उपकरण की आती है तो सौ दो सौ रुपये बचाना हमें समझदारी का काम लगता है।यह संवाद यह भी बताता है कि खतरा केवल ड्राइवर के लिए नहीं, बल्कि पीछे बैठने वाले के लिए भी उतना ही है, और यही वह पहलू है जिसे समाज अक्सर हल्के में लेता है। भारत में जितने भी गंभीर सिर चोट के मामले आते हैं, उनमें बहुत बड़ी संख्या बिना हेलमेट पिलियन राइडर्स की होती है ।यह संवाद पाठक को मजबूर करता है कि वह खुद से सवाल पूछें कि हम अपनी जीवन की सुरक्षा को आखिर इतना कम क्यों आंकते हैं?मेरी समग्र राय यह है कि यह संवाद छोटा होते हुए भी सारगर्भित है, सामाजिक जिम्मेदारी का भाव जगाता है, और पाठक को यह याद दिलाता है कि अनुशासन ही असली सुरक्षा है, बाकी सब बाद की बातें हैं।
Sumukh Dashputre: डॉ अनिल कुमार जी भदौरिया को सूचित कर रहा हूं l

Rajesh Kumar Sinha: 👏

3 thoughts on “Protection!

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  1. हेल्मेट की कीमत बचाने पर जिंदगी की कीमत चुकाना सबसे महंगा सौदा है l अनुशासन ही सुरक्षा का आधार है l तेज और अंधाधुंद गति वाहन और जीवन दोनों के लिए विनाशकारी होती है l इस को टाला और कम किया जा सकता है l बातों बातों ही में बडी बात बताई गई है l सर सलामत तो पगडी पचास l सरल सामान्य भाषा है, संदेश स्पष्ट है l उत्तम प्रस्तुति के लिए साधुवाद l👌👏

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