Vanvaas (464)

क्या हमारे जीवन में भी वनवास है?
यदि है तो वह किस रूप में प्रस्तुत होता है?
कलियुग में वनवास के क्या मायने हैं ?

भारतीय चिंतन में वनवास का एक विशिष्ट स्थान है जहाँ पर त्रेतायुग में भगवान श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास और द्वापर युग में पाण्डवों को 13 वर्ष के वनवास के दृष्टांत प्राप्त होते हैं. कहने को तो यह विश्व इस घटनाक्रम को पारिवारिक क्लेश का परिणाम मानता है परंतु वनवास का प्रथम दृष्ट्या यह दौर राजनीति के सबसे मलिन स्वरूप का प्रतीक है. यह बात पृथक है कि भगवान श्रीराम ने इस वनवास की आपदा को अपने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की अभिनव प्राप्ति में बदल लिया तो वहीं पांडवों ने अपने शौर्य कौशल के विकास में उपयोगित कर लिया.

कहने का तात्पर्य है कि वनवास को भी आपदा जानते हुए उसे अपने बुद्धि कौशल, धीरज और दूरदृष्टि से अवसर में बदल दिया और समाज के लिए एक संदेश स्थापित किया!

इस कलियुग में वनवास की गाथा समय की लीला के रूप में हर व्यक्ति के जीवन में आती है और धन यश, सत्ता के लिए घर छोड़ संघर्ष करने को परदेश के लिए निकलना होता है. यही वनवास है कोई अपने गाँव से निकलकर छोटे शहर में रोज़गार के लिए आता है तो कोई छोटे शहर से निकल कर बड़े शहर में कोई बड़े शहर से निकलकर मेट्रो शहर में पहुँचता है तो कोई कोई तो देश छोड़ परदेश का वनवास भोगने को निकल पता है.

वनवास प्रत्येक के लिए उन्नति, प्रगति और विकास के अवसर पैदा कर सफल हो जाने का अवसर है. जो मायालीन हैं उनके लिए मायालोक की धन-संपदा, यश और शक्ति प्राप्ति एक ध्येय है. अन्य साधु ह्रदय के लिये आध्यात्मिक मोक्ष की प्राप्ति भी मृत्युलोक में जन्म लेकर इस यात्रा का कारण हो सकती है. मृत्युलोक में पुनर्जन्म ले कर बार बार जन्म ले दर्द सहने से मुक्ति की दिशा में आपका चिंतन वनवास की यात्रा के लिए प्रेरित कर सकता है जो या तो भौतिक रूप से वनवास के वास्तविक यात्रा हो सकती है अथवा मानसिक रूप से समाज में रहते हुए भी आभासी वनवास की प्राप्ति के प्रयास रूपी हो सकती है जैसे बारिश में रहो परंतु भीगो नहीं.

वनवास बिखरा पड़ा है, जो चाहे सो ले ले और ध्यान केंद्र कर जीवन सिद्ध कर ले.

2 thoughts on “Vanvaas (464)

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  1. एक ओर जहाँ वनवास का अभिप्राय सामान्यतः वन की ओर प्रस्थान समझा जाता है, वहीं यहाँ पर इस की व्यापक व्याख्या की गई है l भावार्थ स्पष्ट है कि मोह त्यागे बिना सिद्धि में पूर्णता नहीं मिलती है l किसी पुष्प को प्रभु पर अर्पित होने के लिए शाखा से वियोग सह कर भी अपने आकर और सुगंध को बनाए रखना आवश्यक है l गहन विवेचन हेतु लेखक को साधुवाद l उत्तम आलेख 👌👌

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